
CRS NEWS: राजस्थान के सरकारी अस्पताल इन दिनों काफी चर्चा में हैं। कभी ‘जीवन देने’ वाले ये केंद्र अब ‘जान लेने’ के ठिकानों के रूप में देखे जा रहे हैं। राज्य की मातृ स्वास्थ्य व्यवस्था इस वक्त वेंटिलेटर पर है।
प्रदेश भर में प्रसव के बाद 18 से ज्यादा गर्भवती महिलाओं की दर्दनाक मौत हो चुकी है, जबकि करीब 50 महिलाएं गंभीर रूप से बीमार हैं। वहीं दूसरी तरफ, सिस्टम के मुखिया यानी राजस्थान के स्वास्थ्य मंत्री गजेंद्र सिंह खींवसर (Gajendra Singh Khinvsar) इन मौतों की जिम्मेदारी लेने के बजाय पल्ला झाड़ते नजर आ रहे हैं।
लापरवाही की इंतहा: दवा की जगह पानी और संक्रमित औजार
सरकारी सिस्टम की लापरवाही का आलम यह है कि अस्पतालों में महिलाओं को जो जीवनरक्षक इंजेक्शन लगाए गए, उनमें दवा की जगह सिर्फ पानी था। इसके अलावा, ऑपरेशन थियेटर (OT) में डॉक्टरों और स्टाफ के पास औजारों को साफ (Sterilize) करने तक का समय नहीं है।
इन मौतों के पीछे के खौफनाक तथ्य:
भीलवाड़ा का महात्मा गांधी अस्पताल: यहां हर रोज 30 से 40 सिजेरियन (C-Section) ऑपरेशन होते हैं, लेकिन सर्जिकल इंस्ट्रूमेंट सेट सिर्फ 8 हैं। मेडिकल नियमों के अनुसार, एक सेट को दोबारा इस्तेमाल करने से पहले 3 घंटे स्टरलाइज (संक्रमण मुक्त) करना जरूरी है। लेकिन जल्दबाजी में प्रसूताओं को इन्फेक्शन के हवाले कर दिया गया। नतीजा— 6 दिन में 5 मौतें।
कोटा का जेके लोन अस्पताल: यहां नकली दवाइयों का खौफनाक खेल सामने आया। जांच में पता चला कि प्रसूताओं को लगाए गए ऑक्सीटोसिन (Oxytocin) इंजेक्शन में दवा की जगह महज पानी भरा हुआ था।
किडनी फेलियर और संक्रमण से तड़प-तड़प कर गई जान
अस्पतालों की इन गंभीर लापरवाहियों के कारण प्रसूताओं को भारी कीमत चुकानी पड़ी। बीकानेर और कोटा में सिजेरियन के बाद कई महिलाओं की किडनी ने काम करना बंद कर दिया। अत्यधिक रक्तस्राव (Heavy bleeding) और गंभीर संक्रमण (Infection) के कारण ये महिलाएं तड़प-तड़प कर मौत के मुंह में समा गईं।
प्रदेश भर के अस्पतालों का डराने वाला आंकड़ा
राजस्थान के अलग-अलग जिलों से आ रही तस्वीरें किसी को भी विचलित कर सकती हैं:
कोटा (Kota): संक्रमण से 5 महिलाओं की मौत। हाईलेवल कमेटी ने अपनी रिपोर्ट मंत्री को सौंप दी है, लेकिन इसे अब तक सार्वजनिक नहीं किया गया है।
भीलवाड़ा (Bhilwara): संक्रमित औजारों के इस्तेमाल से 6 दिन के भीतर 5 मौतें।
बांसवाड़ा (Banswara): महज 4 दिन के अंदर 4 प्रसूताओं ने दम तोड़ा।
जोधपुर और बीकानेर (Jodhpur & Bikaner): प्रसव के बाद जटिलताओं और किडनी फेलियर से 5 प्रसूताओं की जान गई।
स्वास्थ्य मंत्री का शर्मनाक रवैया: “बाकी बातें ब्रेक के बाद…”
इतनी बड़ी त्रासदियों के बीच सबसे ज्यादा हैरान करने वाला रवैया राजस्थान के स्वास्थ्य मंत्री गजेंद्र सिंह खींवसर का रहा। जयपुर में बुलाई गई 3 घंटे की मैराथन बैठक के बाद जब मीडिया ने तीखे सवाल किए, तो मंत्री जी मुस्कुराते हुए उठ खड़े हुए।
गरीबों की मौतों पर अफसोस जताने या कोई सख्त कदम उठाने की बात करने के बजाय, वे प्रेस कॉन्फ्रेंस यह कहकर छोड़कर चले गए कि— “बाकी बातें ब्रेक के बाद… यानी दो दिन के दौरे से लौटने के बाद करेंगे।”
मंत्री महोदय सिस्टम की कोई भी लापरवाही मानने को तैयार नहीं हैं। अपनी सफाई में वे कहते हैं, “लोग सरकारी अस्पताल इसलिए आते हैं क्योंकि जब निजी अस्पताल गंभीर मरीजों का इलाज करने से मना कर देते हैं, तब वे हमारे पास आते हैं।” कभी वे राष्ट्रीय स्तर के प्रसव आंकड़ों की दुहाई देते हैं, तो कभी मौतों का कारण डिहाइड्रेशन बताते हैं। लेकिन, एक साथ इतनी प्रसूताओं की जान कैसे चली गई? इसका ठोस जवाब उनके पास नहीं है।
जांच के नाम पर समितियां, लेकिन इंसाफ कब?
मामले के तूल पकड़ने पर सरकार ने जांच समितियां बना दी हैं। कुछ डॉक्टरों और नर्सिंग स्टाफ को निलंबित (Suspend) या एपीओ (APO) कर दिया गया है। ओटी (OT) प्रोटोकॉल से लेकर दवाओं के सैंपल तक की जांच की जा रही है।
लेकिन, अंत में सवाल यही उठता है कि— जिन परिवारों ने अपनी बेटियों, बहुओं और नवजातों की माताओं को खोया है, उन्हें इंसाफ कब मिलेगा? क्या इन पीड़ितों को भी इंसाफ ‘ब्रेक के बाद’ ही मिलेगा? सरकारी सिस्टम की इस जानलेवा लापरवाही का असली जिम्मेदार आखिर कौन है?






