
‘हर बार आरोपी के पैर में ही गोली कैसे लगती है?’ अदालत ने पुलिस की कहानी पर उठाए गंभीर सवाल, कहा- सजा देना न्यायपालिका का काम
लखनऊ/प्रयागराज। उत्तर प्रदेश में पुलिस मुठभेड़ों और कथित ‘हाफ एनकाउंटर’ को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बेहद सख्त रुख अपनाया है। श्रावस्ती में हुए एक कथित हाफ एनकाउंटर की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने पुलिस की कार्रवाई और मुठभेड़ की कहानी पर गंभीर सवाल उठाते हुए मामले की जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) को सौंपने का आदेश दिया है।
अदालत ने इस बात पर विशेष आपत्ति जताई कि पुलिस मुठभेड़ों के मामलों में अक्सर पुलिसकर्मियों के सुरक्षित रहने और आरोपी के पैरों में गोली लगने की कहानी सामने आती है। कोर्ट ने सवाल किया कि यदि आरोपी पुलिस टीम पर अंधाधुंध फायरिंग करता है तो पुलिसकर्मियों की वर्दी तक को एक छर्रा नहीं लगता, लेकिन जवाबी कार्रवाई में पुलिस की गोली आरोपी के घुटने या उससे नीचे ही कैसे लगती है?
15 मीटर की दूरी से अंधेरे में पैरों पर सटीक निशाना लगाने पर सवाल
मामला श्रावस्ती के कथित हाफ एनकाउंटर से जुड़ा है। सुनवाई के दौरान पुलिस की ओर से पेश की गई कहानी में बताया गया कि पुलिस टीम ने कार्रवाई के दौरान आरोपी के पैरों में गोली मारी। अदालत ने इस दावे की विश्वसनीयता पर सवाल उठाते हुए यह जानने की जरूरत बताई कि रात के अंधेरे में करीब 15 मीटर की दूरी से केवल हथियार लोड किए जाने की आवाज के आधार पर पुलिस अधिकारी दोनों पैरों में सटीक निशाना कैसे लगा सकता है।
हाईकोर्ट ने CBI को मामले की जांच करते हुए पुलिस की FIR में दर्ज घटनाक्रम की सत्यता और मुठभेड़ के दौरान अपनाई गई कार्रवाई की भी जांच करने को कहा है। रिपोर्ट यथासंभव तीन महीने के भीतर दाखिल करने का निर्देश दिया गया है।
‘सजा देने का अधिकार पुलिस का नहीं’
अदालत ने कथित हाफ एनकाउंटर की प्रवृत्ति पर टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया कि किसी आरोपी को सजा देने का अधिकार पुलिस के पास नहीं है। सजा देना न्यायपालिका का काम है। अदालत ने इस बात पर भी चिंता जताई कि यदि पुलिस कार्रवाई प्रमोशन, वरिष्ठ अधिकारियों की वाहवाही अथवा सोशल मीडिया पर लोकप्रियता हासिल करने के लिए की जाती है तो यह कानून-व्यवस्था और न्याय के लिए गंभीर खतरा है।
पुलिस की FIR में भी बताई गईं विसंगतियां
कोर्ट के सामने मामले की सुनवाई के दौरान पुलिस की ओर से दर्ज FIR में कई कथित विसंगतियां सामने आईं। अदालत ने प्रथम दृष्टया पुलिस के घटनाक्रम को लेकर गंभीर संदेह व्यक्त किया और कहा कि मामले की निष्पक्ष जांच जरूरी है। इसी वजह से स्थानीय पुलिस की जांच के बजाय CBI को जांच सौंपने का निर्णय लिया गया।
पुलिस की निशानेबाजी क्षमता भी जांचेगी CBI
मामले में अदालत ने पुलिस अधिकारी अश्विनी कुमार दुबे की शूटिंग क्षमता को भी जांच के दायरे में रखने का निर्देश दिया है। खासतौर पर यह जांच की जाएगी कि क्या वह रात के समय लगभग 15 मीटर की दूरी से 9 एमएम सर्विस पिस्टल से इतनी सटीक गोली चला सकते थे कि गोली आरोपी के पैरों में ही लगे।
एनकाउंटर को लेकर पहले भी सख्त हो चुका है हाईकोर्ट
यह पहली बार नहीं है जब इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश में पुलिस एनकाउंटर की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं। इससे पहले भी अदालत ने कहा था कि पुलिस कानून से ऊपर नहीं है और अनावश्यक गोली चलाना स्वीकार्य नहीं हो सकता। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय एनकाउंटर संबंधी दिशा-निर्देशों का कड़ाई से पालन करने पर जोर दिया है।
अब CBI जांच से सामने आएगा सच
हाईकोर्ट के आदेश के बाद श्रावस्ती के इस कथित हाफ एनकाउंटर की जांच अब CBI के हाथ में होगी। जांच एजेंसी पुलिस की FIR, घटनास्थल, हथियार, गोलीबारी की परिस्थितियों, मेडिकल और अन्य उपलब्ध साक्ष्यों की पड़ताल करेगी। साथ ही यह भी जांच का विषय होगा कि पुलिस की ओर से बताई गई मुठभेड़ की कहानी वास्तविक घटनाक्रम से मेल खाती है या नहीं।
हाईकोर्ट की इस टिप्पणी ने उत्तर प्रदेश में ‘हाफ एनकाउंटर’ की कार्यप्रणाली और पुलिस कार्रवाई की जवाबदेही को लेकर एक बार फिर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। अब CBI की जांच रिपोर्ट पर निगाह रहेगी, जिससे यह स्पष्ट होगा कि श्रावस्ती की मुठभेड़ वास्तव में पुलिस की वैध आत्मरक्षात्मक कार्रवाई थी या उसके पीछे कुछ और कहानी थी।






