
किठावां में डॉक्टर अनुज नागेंद्र की अध्यक्षता और क़ासिम हुनर सलोनी के संचालन में एक काव्य गोष्ठी का आयोजन किया
सलोन रायबरेली
बज़्मे हयाते अदब के तत्वाधान में काशाना ए हयात किठावां में डॉक्टर अनुज नागेंद्र की अध्यक्षता और क़ासिम हुनर सलोनी के संचालन में एक काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया। जिसमें मालेगांव से आए हुए शायर अज़ीज़ सागर का सम्मान किया गया ।पसंदीदा शेर पेशे ख़िदमत हैं । डॉक्टर अनुज नागेंद्र- जिसको हम रखते हैं पुतली की तरह पलकों पर, लेके आंखों का वही नूर चला जाता है। क़ासिम हुनर सलोनी – मुझे तो तोलते रहते हो हरदम, कभी तुम ख़ुद को भी तुलवा के देखो। अज़ीज़ सागर मालेगांव -जानता हूं कि उधर जाने पे ख़तरा होगा, अक़्ल रोके है मगर जाने को जी चाहता है। यासिर नज़र- उसी का मुंह चिढ़ाएंगे ये बौने, किसी का क़द अगर ऊंचा लगेगा। शान सलोनी- मोहब्बत से अगर मिलकर रहें हम, तो हिंदुस्तान और अच्छा लगेगा। गीतेश जन्नत- फ़रेब झूठ से ऊपर कभी न उठ पाए, दलाल जितने थे वो सब इधर-उधर में रहे ।अम्मार सहर- फैलाते हैं जो ज़ह्र फ़सादात का हर सू ,वो सर मेरे तीरों के निशाने के लिए हैं ।तय्यार ज़फ़र -जब करोगे फ़साद की बातें, मुझको अपने ख़िलाफ़ पाओगे ।मुख़्तार आशिक़ नसीराबादी-जब दिल करे तुम्हारा बेख़ौफ़ आ ही जाना, हम जान अपनी देंगे तेरी दोस्ती के पीछे ।अनीस देहाती – वो तो ज़रदार के हाथों का खिलौना है बना, जिसकी तक़दीर में लिखी है फ़क़ीरी साहब ।नफ़ीस अख़्तर सलोनी -खोले हुए परों को मैं उड़ता हूं दूर-दूर, सैयाद तुझ से जान बचाने के वास्ते ।हाशिम उमर- वक़्ते रुख़सत गया है ख़ाली हाथ ,आओ ले लें सबक़ सिकंदर से। दिलशाद रही- उसको भूलने की मैं कोशिशें करूंगा जब, मेरे लब पे नाम उसका बे हिसाब आएगा। आमिर क़मर- जिन्हें क़दमों में होना चाहिए था ,उन्हें सर पर बिठाया जा रहा है ।सद्दाम शाहिद -जवां होकर करें मां-बाप का सर फ़ख़्र से ऊंचा, करें यूं तरबियत मां-बाप बचपन में ज़रूरी है। श्याम मनमौजी ने भी अपनी रचनाओं से सबको रसास्वादित किया ।आख़िर में नौशाद अंसारी, और इरशाद राईनी ने सबका शुक्रिया अदा कियाऔर अपने विचार व्यक्त किये। इस अवसर पर नौशाद अंसारी, इरशाद राईनी ,नईम, अमजद ,इस्लाम ,शमीम, मुबीन ,आलम ,शाहबाज़ सीबू, वक़ार ,बिलाल ,नजम असग़र वग़ैरा मौजूद रहे।









