केमिकल द्वारा कृतिम तौर पर पकाए फल हमारे लिए ज़हर से कम नही!
(CRS इमरान साग़र की क़लम से)
शाहजहाँपुर-कैल्शियम कार्बाइड या कारबेट रूपी रसायन, एक प्रकार से पत्तर के रूप में गैस बताई जाती है जो नमी मिलते ही पूरी तरह सक्रिय हो जाती है और ऑक्सीज़न के साथ लोहा, पीतल, ताँवा आदि धातुओं पर बेल्डिंग कर जोड़ने के काम में अधिक प्रयोग किया जाता है! सीधे तौर पर गैस बेल्डिगं में काम आना वाला यह रसायन शरीर के लिए काफी घातक बताया जाता है!
बाजार में नई फसल बेच कर अधिक मुनाफा कमाने की चाह यानि ऊँचे दामो में, फलो को वृक्षो में पकने से पूर्व, तोड़ कर कर कृतिम तौर पर पकाने के लिए कैल्शियम कार्बाइड का प्रयोग किया जाता है! यह रसायन नमी के साथ प्रतिक्रिया कर कार्बाइड गैस बनाता है जो साथ रखे गए कच्चे फलों के ढेर को बक्त से पहले पका देती है!
बताते हैं कि कैल्शियम कार्बाइड से पकाए गए फल खाने से कैंसर, लीवर और गुर्दा खराब हो सकता है, शरीर में एलर्जी होने से भी इंकार नही किया जा सकता! कैल्शियम कार्बाइड से पकाए गए फलों में पाए जाने वाले प्राकृतिक पौष्टिक तत्व कम हो जाते हैं! ऐसे फल खाने से पेट दर्द, उल्टी-दस्त भी हो सकता है! कैल्शियम कार्बाइड रासायनिक पदार्थ है, जो फलों की नमी व पानी से क्रिया करके इथाइल गैस बनाता है!
समय से पहले, वृक्षो से फल तोड़ कर इस सस्ती विधि से पका कर बाजार मेें बेचने की प्रक्रिया 80/90 के दशक से काफी तेजी प्रचलन में आ गई! आज हालात यह हो चले कि डाल पर पका फल बाजार में जहाँ ग्राहक न के बराबर पकड़ता है तो वहीं डाली फल को अधिक समय तक स्टोर नही किए जाने की मिथ्या के चलते, इसी का फायदा उठा कर कच्चा फल स्टोर कर, जब बाजार में बेचना हो तो उक्त केमिकल से पका कर फौरन सप्लाई दे दी जाती है!
रसायन केमिकल द्वारा पकाये हुए फल, इंसान की जुवाँ पर अपने स्वाद की बादशाहत जमा गये और डाल का पका फल अब जुबान पर स्वाद नही लाता परन्तु सच़ यह है कि जिस केमिकल से पके फल हम मंहगे दामो में खरीद कर जुबान का स्वाद बना रहे हैं वे किसी भी तरह पौष्टिक नही होने के कारण हमे बीमारियों की ढ़केल रहे हैं! केमिकल द्वारा कृतिम तौर पर पकाए फल हमारे लिए ज़हर से कम नही! बेहतर है कि फलो को वृक्ष के अलावा पकने के लिए कोई और पुराना प्राकृतिक बिकल्प जल्द ही तलाश करना चाहिए जिससे की वृक्ष से कच्चा फल तोड़ कर स्टोर करने पर पुरानी और प्रकृतिक विधि से से पकाने से कमसे कम उसकी पौष्टिकता तो बरकरार रहे!







