गौरैया पक्षी को बचाने में हम अपना सहयोग दें, जीवन सवांरने के लिए!

CRS इमरान साग़र की क़लम से!
उ०प्र०-गांव, नगर, शहर में पेड़ पौधो की शाखाओं पर, घर के आग़न में, छत की मुढ़ेर पर, घरो की खिड़कियों पर और रोशनदानो के बीच मधुर तरंगी धुन छोड़ता हुआ अटखेलियाँ कर मनुष्यो को आक्रषित करती गौरैया प्रजताति मात्र एक दशक पूर्व से जैसे पूरी तरह विलुप्त हो गई! लाख जतन के बाद भी निगाहो में कहीं नज़र न आने वाला गौरैया पंछी भले ही कद में छोटा सही लेकिन इस मासूम से पंछी ने ज़मीं के वातावरण को स्वच्छ और सुरक्षित रखने में अपना भरपूर सहयोग बनाए रखा! इस बात से तनिक भी इंकार नही किया जा सकता कि मानव जीवन में जिन पशु पंछियों की सांसो के साथ जरुरत है उनका सिर्फ इतिहास मात्र बना कर दिवस के रूप में ही नही मनाया जा सकता बल्कि उन्हे फिर से स्थापित करने के लिए युद्ध स्तर की जागरुकता के साथ धरातल पर काम करना होगा नही हमारा भी जीवन बचने की संभावना से भी इंकार नही किया जा सकता!
लगभग पूरी तरह विलुप्त हो रहा यह नन्हा और मासूम सा सुन्दर पंछी को बचाने के लिए बनाया गया प्रोजेक्ट, अब हर वर्ष 20 मार्च को गौरैया दिवस के रूप में मनाया जाने लगा! वर्ष में एक दिन गौरैया को याद करने भर से उसे बचाने की जागरुकता का हालांकि कोई मतलब तब तक नही जब विलप्त हो रहा गौरैया पंछी फिर हमारी नज़रो में आकर हमें अपनी मधुर तरंगी धुन और अटखेलियों से आक्रषित न करने लग जाए!
जून 2022 में गौरैया बचाओं की जागरुकता में हिन्दी विवेक पोर्टल ने गूगल पर जो लिखा उसमें विशेष-
गांव के कच्चे घरों में पहले गौरैया का निवास अक्सर देखने को मिलता था। कच्चे घरों पर रखे अनाज और घर के आंगन में गिरा चावल खाने के लिए यह आपस में ही लड़ जाती थी! घर के बच्चे भी इनके पीछे पीछे दौड़ते और पकड़ने की कोशिश करते! गौरैया भी आंगन में इधर से उधर दौड़ती लेकिन घर नहीं छोड़ती थी। मानों यह उनका ही घर हो! पूरा दिन गौरैया की आवाज़ घर में गूंजती रहती थी!
पश्चिमी सभ्यता ने बड़ी ही तेजी से भारतीय सभ्यता पर कब्जा किया, कहने के लिए तो हम एडवांस होने लगे लेकिन इस एडवांस बनने के चक्कर में हमने अपना बहुत कुछ गंवा दिया और अभी भी गंवाते जा रहे है! तेजी से बढ़ते भौतिक सुख के चक्कर में हम तमाम ऐसी चीजों को अपने आस-पास इकट्ठा कर रहे है जिसका दुष्प्रभाव हमारे शरीर और पर्यावरण दोनों पर पड़ रहा है और हम ऐसे तमाम जीव जंतुओं को नुकसान पहुंचा रहे है जिससे हमारे जीवन में फायदे थे!
गौरैया पक्षी भी मनुष्य के साथ करीब 10 हजार साल से रह रही है लेकिन अब इनकी संख्या बहुत ही तेजी से कम होती जा रही है! एक अध्ययन के मुताबिक भारत में गौरैया की संख्या में करीब 60 फीसदी की कमी आयी है! शहरीकरण के लगातार हो रहे विस्तार की वजह से पक्षियों के जीवन पर विशेष प्रभाव पड़ा है! ऊंची ऊंची इमारतों के लिए जंगल और पेड़ काटे जा रहे है जिससे तमाम जीव जंतुओं का निवास खत्म हो जा रहा है! पक्षी के लिए पेड़ और पानी उपलब्ध नहीं हो पा रहा है जिससे इनका जीवन समय से पहले खत्म हो जा रहा है! जंगल से इन्हे रहने के लिए घर और खाने के लिए फल मिलते थे, नदीं से यह अपनी प्यास बुझाते थे लेकिन अब यह सब खत्म हो रहा है जिससे छोटे बड़े सभी जीवों का जीवन खत्म होता जा रहा है! हमारे तेजी से बदलते जीवन गौरैया का लिए हानिकारक साबित हो रहे है!
पेड़ों की कटाई, खेतों में रासायनिक खादों का इस्तेमाल, मोबाइल टॉवर से निकलती तरंगे, इमारतों पर लगे शीशे और कंक्रीट की बनती ईमारतें इनके जीवन को बाधित कर रही है! इतना ही नहीं अब गांव में भी घरों और रास्तों को तेजी से पक्का किया जा रहा है जिससे इन्हे घोंसला बनाने के लिए मिट्टी और खरपतवार नहीं मिल रहा है! गौरैया को आप ने धूल में भी खेलते देखा होगा जो अब बिल्कुल भी नहीं मिल पा रहा है! हिन्दी विवेक ने हालांकि आगे बहुत कुछ सिर्फ हमे जागरुक करने के लिखा और साथ ही यह अपील कि
आप सभी से अपील करता है कि आप भी इस पक्षी को बचाने में अपना सहयोग दें!









