
CRS NEWS :- देश भर में जारी NEET पेपर लीक विवाद और छात्रों के उग्र आंदोलन के बीच प्रसिद्ध शिक्षाविद विकास दिव्यकीर्ति ने अपनी चुप्पी तोड़ी है। अपनी एक कोचिंग क्लास के दौरान इस मुद्दे पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि सरकार को शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा पहले ही ले लेना चाहिए था। छात्रों की बात सुनने से सरकार की छवि कमजोर नहीं, बल्कि और मजबूत होती।
विकास दिव्यकीर्ति के अनुसार, नीट पेपर लीक के बाद कुछ छात्रों द्वारा आत्महत्या किए जाने की घटनाओं ने युवाओं के गुस्से और असंतोष को एक साथ जोड़ दिया। इसी वजह से जंतर-मंतर पर न केवल नीट के अभ्यर्थी, बल्कि समाज के विभिन्न वर्गों से नाराज लोग भी एकत्र हो गए।
उन्होंने संकेत दिया कि इस बड़े आंदोलन की शुरुआत एक गैर-जरूरी टिप्पणी से हुई। उनका इशारा मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत के उस कथित बयान की ओर था, जिसमें उन्होंने बेरोजगार युवाओं के संदर्भ में टिप्पणी की थी। इसी के बाद सोशल मीडिया पर ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) का गठन हुआ, जो आज इस पूरे छात्र आंदोलन का प्रमुख चेहरा बन चुकी है।
“अगर किसी नाराजगी भरे बयान से इतनी बड़ी पार्टी/आंदोलन खड़ा हो सकता है, तो CJI को भी अपने शब्दों के प्रति बेहद सावधान रहना चाहिए था।”
विकास दिव्यकीर्ति ने यह भी कहा कि आखिर मोदी सरकार शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा लेने से क्यों हिचकिचा रही है:
ओबीसी का बड़ा चेहरा: धर्मेंद्र प्रधान बीजेपी के लिए एक महत्वपूर्ण ओबीसी नेता हैं। ओडिशा में बीजेपी की पहली सरकार बनवाने में उनकी अहम भूमिका रही है।
कार्यशैली का तर्क: सरकार का मानना हो सकता है कि शिक्षा मंत्री के रूप में उनका कामकाज पूर्ववर्ती मंत्रियों से बेहतर रहा है।
साख और ‘इकबाल’ का सवाल: जो सरकारें अत्यधिक आत्मविश्वास में होती हैं, वे आसानी से इस्तीफे नहीं देतीं। सरकार को डर रहता है कि इससे यह संदेश जाएगा कि दबाव बनाकर या मोर्चा खोलकर सरकार को झुकाया जा सकता है।
पूर्व में रेल हादसों पर मंत्रियों के इस्तीफे की राजनीतिक परंपराओं का हवाला देते हुए दिव्यकीर्ति ने कहा कि अब यह मुद्दा सरकार की साख की लड़ाई बन गया है। उन्होंने सरकार को ‘इमोशनल इंटेलिजेंस’ का सिद्धांत समझाते हुए सलाह दी:छोटी लड़ाई हारकर बड़ा युद्ध जीतना: यदि कोई मुद्दा इतना बड़ा हो जाए कि उससे व्यापक नुकसान हो सकता हो, तो थोड़ा पीछे हटना बुद्धिमानी है।
सकारात्मक संदेश: अपने ही देश के बच्चों की मांग मानकर एक कदम पीछे खींचने से जनता और छात्रों में यह संदेश जाएगा कि सरकार उनकी बातें सुनती है।





