
CRS NEWS :- चीनी पर आफत! आखिर क्यों आई ऐसी नौबत?भारत में चीनी की कीमतें हाल ही में ₹65 प्रति किलोग्राम के स्तर को पार कर गई हैं, जिससे आम उपभोक्ताओं और बाज़ार विश्लेषकों की चिंता बढ़ गई है। यह उछाल ऐसे समय में आया है जब देश प्रमुख त्योहारी सीजन की ओर बढ़ रहा है। भारत में त्योहारों के दौरान मिठाइयों और पारंपरिक व्यंजनों के निर्माण के कारण चीनी की मांग में स्वाभाविक रूप से भारी वृद्धि होती है। ऐसे में कीमतों का यह रुख घरेलू बजट और खाद्य मुद्रास्फीति दोनों पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है।
आपूर्ति और मांग का असंतुलन: 2025-26 के उत्पादन चक्र के दौरान कुल चीनी उत्पादन अनुमान से काफी कम रहा है। कम पैदावार के साथ-साथ घरेलू स्तर पर मजबूत और निरंतर खपत ने बाज़ार में उपलब्धता को सीमित कर दिया है।
इथेनॉल उत्पादन को प्राथमिकता: सरकार की E20 पेट्रोल सम्मिश्रण नीति के तहत गन्ने के रस और सीरे का एक बड़ा हिस्सा इथेनॉल बनाने में इस्तेमाल किया जा रहा है। हरित ईंधन को बढ़ावा देने के इस कदम से चीनी निर्माण के लिए उपलब्ध गन्ने की मात्रा में कमी आई है, जिससे चीनी का कुल इन्वेंट्री स्तर घट गया है।
निर्यात संबंधी नीतियां: वर्तमान संकट से पहले, भारत सरकार ने 20 लाख (2 मिलियन) मीट्रिक टन तक चीनी के निर्यात की अनुमति दी थी। यद्यपि इसका उद्देश्य वैश्विक बाज़ार का लाभ उठाना था, लेकिन इसने घरेलू आपूर्ति को और अधिक संकुचित कर दिया, जिससे स्थानीय बाज़ार में कीमतों का दबाव बढ़ गया।
इस स्थिति को नियंत्रित करने और बाज़ार में स्थिरता लाने के लिए केंद्र सरकार कई विकल्पों पर विचार कर रही है:
आयात शुल्क में कटौती: वर्तमान में चीनी पर 100% आयात शुल्क लागू है। सरकार इस भारी शुल्क को घटाने या पूरी तरह हटाने पर विचार कर रही है ताकि विदेशी बाज़ार से सस्ती चीनी भारत आ सके।
कच्ची चीनी का आयात: रिपोर्टों के अनुसार, सरकार शून्य शुल्क पर 10 लाख (1 मिलियन) मीट्रिक टन कच्ची चीनी के आयात की अनुमति दे सकती है। यदि यह निर्णय लागू होता है, तो लगभग एक दशक में यह पहला अवसर होगा जब भारत को घरेलू उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए चीनी आयात का सहारा लेना पड़ेगा।
त्योहारों के दौरान कीमतों को नियंत्रण में रखना सरकार के लिए प्राथमिक चुनौती है, और ये संभावित नीतियां बाज़ार में तरलता बढ़ाकर उपभोक्ताओं को राहत देने के उद्देश्य से बनाई जा रही हैं।







