टेंडर में पारदर्शिता पर सवाल: कमीशन के खेल की चर्चाओं के बीच जांच और जवाबदेही की मांग।
सरकारी विभागों में विकास कार्यों और निर्माण परियोजनाओं के लिए होने वाली टेंडर प्रक्रिया का उद्देश्य योग्य और सक्षम फर्म को पारदर्शी तरीके से काम सौंपना है, लेकिन जब इसी प्रक्रिया में कथित कमीशनखोरी और भ्रष्टाचार की चर्चाएं सामने आने लगें तो पूरी व्यवस्था की निष्पक्षता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
टेंडर जारी होने से लेकर तकनीकी एवं वित्तीय बिड खुलने और अंततः ठेका आवंटित होने तक प्रक्रिया कई चरणों से गुजरती है। नियमों के अनुसार प्रत्येक चरण में पारदर्शिता और प्रतिस्पर्धा सुनिश्चित की जानी चाहिए। बावजूद इसके, कई बार ठेकेदारों के बीच यह चर्चा सुनने को मिलती है कि बिना ‘सेटिंग’ या कथित कमीशन के काम हासिल करना मुश्किल है। हालांकि ऐसी चर्चाओं की सत्यता जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकती है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि किसी टेंडर में अनियमितता, पक्षपात या कमीशनखोरी की शिकायत सामने आती है तो उसकी निष्पक्ष जांच कौन करेगा और कार्रवाई कितनी प्रभावी होगी? क्या टेंडर की शर्तें किसी खास फर्म को लाभ पहुंचाने के लिए तैयार की गईं? क्या प्रतिस्पर्धी बोलीदाताओं को समान अवसर मिला? क्या अनुमानित लागत और स्वीकृत दरों में असामान्य अंतर है? और क्या काम की गुणवत्ता का भी स्वतंत्र सत्यापन कराया गया?
जानकारों का मानना है कि टेंडर प्रक्रिया को संदेह से बचाने के लिए पूरी प्रक्रिया का डिजिटल रिकॉर्ड, बिड मूल्यांकन की स्पष्ट जानकारी, पात्रता मानकों का सार्वजनिक विवरण और शिकायतों की स्वतंत्र जांच बेहद जरूरी है। जहां सरकारी धन खर्च हो रहा हो, वहां केवल कागजी औपचारिकता पर्याप्त नहीं, बल्कि वास्तविक पारदर्शिता दिखाई भी देनी चाहिए।
कथित कमीशनखोरी की शिकायतों को दबाने के बजाय उनकी निष्पक्ष जांच जरूरी है। यदि आरोप गलत हैं तो जांच के बाद संबंधित अधिकारी और संस्था संदेह से मुक्त हो सकती है, लेकिन यदि कहीं नियमों को दरकिनार कर सरकारी धन के साथ खिलवाड़ हुआ है तो जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई भी उतनी ही जरूरी है।
आखिर टेंडर किसी व्यक्ति या ठेकेदार का निजी सौदा नहीं, बल्कि जनता के पैसे से होने वाला सरकारी कार्य है। इसलिए सवाल सिर्फ एक ठेके के मिलने या न मिलने का नहीं, बल्कि सरकारी धन की सुरक्षा, निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा और जनता के भरोसे का है।
अब जरूरत इस बात की है कि जिन टेंडरों में कमीशनखोरी, मिलीभगत अथवा पक्षपात के आरोप लगाए जाते हो, उनकी स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच कराई जानी चाहिए तथा जांच के निष्कर्ष भी सार्वजनिक किए जाने चाहिए। इससे न केवल दोषियों पर कार्रवाई का रास्ता साफ होगा, बल्कि ईमानदारी से काम करने वाले ठेकेदारों का भरोसा भी सरकारी व्यवस्था में कायम रहेगा।
नोट-फोटो AI से निर्मित है।
(टेंडर प्रक्रियाओं में अनियमिताओं की चर्चा पर इमरान सागर का विशेष लेख)






