CRS NEWS AGENCY:- संसद के हालिया सत्र में, सांसद दीपेंद्र सिंह हुड्डा ने वित्त विधेयक (Finance Bill) पर चर्चा के दौरान वर्तमान सरकार की आर्थिक नीतियों पर तीखा हमला बोला। उन्होंने 12 ऐसे ‘रिकॉर्ड’ गिनाए, जो उनके अनुसार भारतीय अर्थव्यवस्था के गहरे संकट का संकेत देते हैं।
1. रुपये का ऐतिहासिक पतन
हुड्डा ने रेखांकित किया कि पिछले 78 वर्षों में भारतीय रुपया अपने सबसे निचले स्तर पर पहुँच गया है। उन्होंने इसकी तुलना ईरान और लेबनान जैसे संघर्षग्रस्त देशों की मुद्राओं से करते हुए चिंता व्यक्त की कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में रुपये की क्रय शक्ति लगातार घट रही है।
2. कमरतोड़ महंगाई और कर का बोझ
भाषण में पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस (LPG) की आसमान छूती कीमतों का मुद्दा उठाया गया। उन्होंने तर्क दिया कि यह महंगाई वैश्विक कारणों से ज्यादा सरकार द्वारा लगाए गए भारी उत्पाद शुल्क (Excise Duty) का परिणाम है।
3. बढ़ती आर्थिक असमानता
हुड्डा ने एक हालिया रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि देश की 40% संपत्ति केवल 1% आबादी के हाथों में सिमट गई है। अमीर और गरीब के बीच की यह खाई सामाजिक स्थिरता के लिए एक बड़ा खतरा बनती जा रही है।
4. कॉर्पोरेट कर्ज माफी बनाम किसान
उन्होंने आरोप लगाया कि जहाँ एक तरफ सरकार ने बड़े कॉर्पोरेट घरानों का 16 लाख करोड़ रुपये का कर्ज ‘राइट-ऑफ’ (बट्टे खाते में डालना) कर दिया, वहीं दूसरी तरफ देश का अन्नदाता आज भी कर्ज के बोझ तले दबा हुआ है।
5. बाजार में बढ़ता एकाधिकार (Monopoly)
दूरसंचार (Telecom) और विमानन (Aviation) जैसे प्रमुख क्षेत्रों का जिक्र करते हुए उन्होंने चेतावनी दी कि इन क्षेत्रों में केवल दो बड़ी कंपनियों का दबदबा होता जा रहा है। प्रतिस्पर्धा खत्म होने से अंततः उपभोक्ताओं को अधिक कीमतें चुकानी पड़ रही हैं।
6. बेरोजगारी और विनिर्माण में गिरावट
हुड्डा ने युवाओं के बीच बढ़ती बेरोजगारी को एक “टाइम बम” बताया। उन्होंने कहा कि GDP में विनिर्माण क्षेत्र (Manufacturing) का योगदान बढ़ने के बजाय घटा है, जिससे ‘मेक इन इंडिया’ जैसे दावों पर सवाल खड़े होते हैं।
अन्य प्रमुख आर्थिक बिंदु:
व्यापार घाटा (Trade Deficit): उन्होंने बताया कि भारत का व्यापार घाटा 283 बिलियन अमेरिकी डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच गया है।
पूँजी का पलायन: विदेशी निवेशकों द्वारा भारतीय बाजार से पैसा निकालने और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) में कमी आने पर चिंता जताई गई।
राष्ट्रीय ऋण: केंद्र और राज्यों का कुल कर्ज अब GDP का 82% हो चुका है, जो भविष्य की अर्थव्यवस्था के लिए चिंताजनक है।
टैक्स विवाद: उन्होंने दावा किया कि राजस्व का एक बड़ा हिस्सा लंबित कानूनी विवादों में फंसा हुआ है, जिससे सरकारी खजाने को नुकसान हो रहा है।
रक्षा बजट: GDP के प्रतिशत के रूप में रक्षा बजट को ऐतिहासिक रूप से सबसे कम बताया गया।
रणनीतिक स्वायत्तता: हुड्डा ने आरोप लगाया कि तेल आयात और व्यापार समझौतों के मामले में भारत अपनी निर्णय लेने की शक्ति अमेरिका जैसे देशों के दबाव में खो रहा है।
निष्कर्ष: दीपेंद्र सिंह हुड्डा का यह संबोधन सरकार के आर्थिक दावों के विपरीत एक वैकल्पिक तस्वीर पेश करता है। उन्होंने सरकार से आग्रह किया कि वह केवल आंकड़ों की बाजीगरी न करे, बल्कि आम आदमी की जेब और रोजगार पर ध्यान दे।









