
CRS NEWS AGENCY:- उत्तर कोरिया में हाल ही में संपन्न हुए संसदीय चुनावों ने एक बार फिर दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा है। रिकॉर्ड 99.98% मतदान और सत्ताधारी पार्टी के पक्ष में लगभग शत-प्रतिशत परिणामों ने इन चुनावों की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
दिखावे की चुनावी प्रक्रिया
उत्तर कोरिया के चुनावी ढांचे में ‘विकल्प’ शब्द का कोई स्थान नहीं है। हर निर्वाचन क्षेत्र में केवल एक उम्मीदवार होता है जिसे वर्कर्स पार्टी द्वारा चुना जाता है। मतदाताओं के पास केवल ‘हाँ’ या ‘नहीं’ का विकल्प होता है, लेकिन ‘नहीं’ चुनना व्यावहारिक रूप से असंभव है।
भय और निगरानी का माहौल
यद्यपि कागजों पर यह मतदान गुप्त होता है, लेकिन वास्तविकता इसके विपरीत है। जो मतदाता सरकार द्वारा अनुमोदित उम्मीदवार के खिलाफ वोट करना चाहते हैं, उन्हें एक विशेष अलग बूथ का उपयोग करना पड़ता है। सार्वजनिक रूप से ऐसा करना सीधे तौर पर किम जोंग उन के शासन को चुनौती देना माना जाता है, जिसका परिणाम जेल या मृत्युदंड भी हो सकता है।
डेटा का हेरफेर
दिलचस्प बात यह है कि इस बार के आंकड़ों में 0.07% वोट विपक्ष में दिखाए गए। विशेषज्ञों का मानना है कि यह कोई वास्तविक विरोध नहीं बल्कि सरकार द्वारा जानबूझकर पेश किया गया एक आंकड़ा है। इसका उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने यह साबित करना है कि देश में “स्वतंत्र और निष्पक्ष” चुनाव होते हैं और वहां असहमति की अनुमति है।
सत्ता के समीकरणों में बदलाव
इन चुनावों में सबसे महत्वपूर्ण बदलाव किम जोंग उन का स्वयं चुनाव न लड़ना रहा। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह उनके “सर्वोच्च नेता” के पद को औपचारिक विधायी प्रक्रियाओं से ऊपर रखने की एक रणनीति है। वहीं, उनकी बहन किम यो जोंग की संसद में एंट्री और लगभग 70% पुराने अधिकारियों का बदला जाना यह दर्शाता है कि किम जोंग उन प्रशासन के भीतर अपनी पकड़ को और अधिक आधुनिक और वफादार नेतृत्व के साथ मजबूत कर रहे हैं।









