
CRS NEWS AGENCY :- Iran पर हमले के लिए America को Saudi Arab ने आखिर क्यों उकसाया? हाल ही में ईरान पर हुए अमेरिकी और इज़राइली हमलों पर ध्यान केंद्रित किया गया है। ‘वाशिंगटन पोस्ट’ की एक रिपोर्ट के अनुसार, सऊदी अरब सार्वजनिक रूप से कूटनीति की वकालत करने के बावजूद, गुप्त रूप से अमेरिका को ईरान पर हमला करने के लिए उकसा रहा था। क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (MBS) ने कथित तौर पर अमेरिका को चेतावनी दी थी कि हमले में देरी करने से ईरान और अधिक शक्तिशाली हो जाएगा।
वे ईरान को दुश्मन मानते हैं लेकिन उन्हें अपने तेल क्षेत्रों पर जवाबी हमले का डर भी है। अमेरिका और इज़राइली हमलों के बाद, ईरान ने सऊदी अरब सहित मध्य पूर्व के विभिन्न देशों में अमेरिकी एयरबेसों पर हमला करके पलटवार किया।
सऊदी अरब और ईरान के बीच दशकों पुराने सत्ता संघर्ष का कारण “मुस्लिम उम्माह” के नेतृत्व की लड़ाई को बताया गया है। यह प्रतिद्वंद्विता 1938 में सऊदी अरब में तेल की खोज और 1979 की ईरानी क्रांति के बाद और तेज हो गई, जिसने ईरान में राजशाही को समाप्त कर दिया और अमेरिका को अपना सबसे बड़ा दुश्मन घोषित कर दिया। सुन्नी बहुल सऊदी अरब और शिया बहुल ईरान के बीच सांप्रदायिक विभाजन को समझाता है, जिसने सीरियाई गृहयुद्ध और यमन के हूती विद्रोह जैसे संघर्षों को हवा दी है।
अंत में, सर्वोच्च नेता खामेनेई की कथित हत्या के बाद ईरान में अस्थिरता और देश को संभालने के लिए अली लारीजानी द्वारा एक अस्थायी नेतृत्व परिषद की घोषणा पर चर्चा करता है।
लेख: मध्य पूर्व में शक्ति संघर्ष और बदलता भू-राजनीतिक परिदृश्य
मध्य पूर्व का क्षेत्र एक बार फिर बड़े बदलावों और तनाव के केंद्र में है। हालिया घटनाक्रमों ने सऊदी अरब, ईरान, अमेरिका और इज़राइल के बीच के नाजुक संतुलन को हिलाकर रख दिया है।
हाल ही में सामने आई ‘वाशिंगटन पोस्ट’ की रिपोर्ट ने वैश्विक राजनीति में खलबली मचा दी है। जहाँ सऊदी अरब दुनिया के सामने शांति और कूटनीति की बात करता रहा है, वहीं पर्दे के पीछे वह अमेरिका पर ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई के लिए दबाव बना रहा था। क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान का मानना है कि समय ईरान के पक्ष में है—जितनी देरी होगी, ईरान उतना ही अधिक सैन्य और परमाणु रूप से सक्षम होता जाएगा।
यह संघर्ष केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि गहरा और ऐतिहासिक है। इसके मुख्य कारण निम्नलिखित हैं। दोनों देश खुद को मुस्लिम जगत (मुस्लिम उम्माह) का असली नेता मानते हैं। सऊदी अरब सुन्नी इस्लाम का केंद्र है, जबकि ईरान शिया इस्लाम का प्रतिनिधित्व करता है। 1938 में सऊदी में तेल मिलना और 1979 की ईरानी क्रांति ने इस दुश्मनी की आग में घी डालने का काम किया।
सऊदी अरब और ईरान सीधे युद्ध के बजाय क्षेत्रीय संघर्षों के जरिए एक-दूसरे से लड़ते रहे हैं। सीरिया का गृहयुद्ध और यमन में हूती विद्रोह इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। हालांकि, सऊदी अरब के लिए सबसे बड़ी चिंता उसके तेल क्षेत्र हैं। ईरान की जवाबी कार्रवाई की क्षमता, जैसा कि अमेरिकी एयरबेसों पर हालिया हमलों से स्पष्ट है, वैश्विक तेल आपूर्ति और सऊदी अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा खतरा बनी हुई है।










