काम का बढ़ता बोझ, पुलिस वालों में ’इंसान’ होने के भाव को ही खोता जा रहा है!

(गोविन्द अवस्थी की कलम से)
24 घंटे लगातार ड्यूटी से होने वाला तनाव, पुलिस कर्मी के चेहरे पर साफ देखा जा सकता है लेकिन यह तनाव युक्त चेहरा आला अफसरो को नज़र नही आता! गौरतलब है कि ऐसी दबाव भरी दिनचर्या एक दिन का मामला नहीं है! पुलिस वालों का जीवन तकरीबन ऐसे ही हर दिन चलता है! एक बार सुबह नहाने के बाद शरीर पर टंगी वर्दी रात के दो बजे के बाद भी बदन से उतर भी पाती है यही नहीं, और अगले दिन दस बजे उन्हें कार्यालय में समय से उपस्थित होना होता है! सप्ताह में चौबीस घंटे का सामान्य ’रूटीन’ यही होता है!
अब जबकि पुलिस का कार्यक्षेत्र लगातार व्यापक होता जा रहा हैं, उनके ऊपर काम का बोझ भी लगातार बढ़ा है! इस काम के बोझ के दौरान उनके दुख दर्द से किसी को कोई मतलब नहीं होता! काम के दबाव में भले ही पुलिस वाले मानसिक स्तर पर टूट जाएं, लेकिन पुलिस विभाग को उनसे कोई हमदर्दी नहीं होती है!
पुलिस अधिकारियों के स्तर पर एक सामान्य समझ विकसित कर ली गयी है कि विभाग में सब कुछ ’ठीक’ है और उसे किसी तरह के सुधार की जरूरत नहीं है! पुलिस के अफसर जवानों की बेहतरी पर बात करना अपनी ’तौहीन’ समझते हैं! उनका वर्ग चरित्र शासक वर्ग का होता है जो जवानों को महज एक ’गुलाम’ भर समझता है!
उत्तर प्रदेश में कानून-व्यवस्था का सवाल पिछले कई सालों से विधानसभा चुनाव में राजनैतिक बहस का मुद्दा बनता रहा है, लेकिन, इस बात पर राजनीति में कभी कोई बहस नहीं होती कि आखिर कानून का शासन स्थापित करने में लगे लोगों-खासकर ’पुलिस’ के सिपाहियों-दारोगाओं की मानवीय गरिमा को सुनिश्चित कैसे रखा जाए ?
कानून व्यवस्था के खात्मे का रोना सभी दल भले ही रोते हों, लेकिन कानून व्यवस्था की जिम्मेदारी उठाने वाले पुलिस के इन सबसे निचले स्तर के जवानों के दुख दर्द उनकी बहस का हिस्सा नहीं होते हैं! पुलिस के कर्मचारी चाहे जितने जोखिम और तनाव में काम करें लेकिन उन्हें इंसान समझने और उसकी इंसानी गरिमा सुनिश्चित करने की ’भूल’ कोई भी राजनैतिक दल नहीं करना चाहता है! गौरतलब है कि अन्य राज्यों के मुकाबले उत्तर प्रदेश में प्रति पुलिस कर्मी सबसे ज्यादा आबादी रहती है! जहां तक इसके संख्या बल का सवाल है, यह रिक्तियों की भीषण कमी से साल दर साल लगातार जूझ रही है! पुलिस थानों का हाल यह है कि कई थाने अपनी कुल स्वीकृत पुलिस बल के आधे से भी कम संख्या पर किसी तरह से अपना काम चला रहे हैं!
पुलिस के पास आने वाली शिकायतों की जांच के लिए दारोगा की जगह सिपाही या फिर होमगार्ड भेजकर काम चलाया जा रहा है! यह सब पुलिस के प्रोफेशनलिज्म़ का न केवल मजाक है बल्कि कानून सम्मत भी नहीं हैं! जाहिर है इससे पीड़ित के लिए इंसाफ पाने की प्रक्रिया भी गंभीर तौर पर बाधित होती है! यही नहीं, साल दर साल जिस तरह से पुलिस की जिम्मेदारियाँ और कार्यक्षेत्र बढ़ रहा हैं, ठीक उसी अनुपात में उसका संख्या बल लगातार घटता जा रहा है! कार्य बल में लगातार हो रही कमी पुलिस की कार्यक्षमता पर बहुत ही नकारात्मक असर डाल रही है! इससे एक तरफ अपराध नियंत्रण में मुश्किल तो होती ही है, पुलिस के कर्मचारियों पर काम का दबाव भी काफी बढ़ जाता है!
काम के इसी दबाव के कारण पुलिस वाले आज अपनी मानवीय गरिमा को ’भूल’ चुके हैं और शारीरिक तथा दिमागी रूप से बीमार होते हुए लगातार ’हिंसक’ हो रहे हैं! बिना अवकाश के लगातार ’ड्यूटी’ करने वाले पुलिस वाले लगभग सब गंभीर रूप से ’अवसाद’ का शिकार हो रहे हैं! यह सब पुलिस वालों में अपने कर्तव्य पालन को लेकर एक गंभीर ’तनाव’ पैदा करता है! जाहिर है काम का बढ़ता बोझ, पुलिस वालों में ’इंसान’ होने का भाव ही खत्म होता जा रहा है!
हर वर्ष लगभग चार प्रतिशत, कार्यबल पुलिस सेवा से सेवानिवृत्त और बर्खास्तगी इत्यादि कारणों से स्टाफ से हट जाता है, लेकिन इसकी भरपायी के बतौर नयी भर्तियां नहीं की जाती हैं! इससे मौजूदा स्टाॅफ पर और ज्यादा बोझ बढ़ जाता है जो कि ’तनाव’ पैदा करता है! इस तनाव का असर जवानों की जीवनशैली में भी साफ देखा जाता है! डिप्रेशन और अथाह काम के इस बोझ ने पुलिसकर्मियों को ’बीमार’ बना दिया है! जिम्मेदार इस समस्या पर बात क्यों नहीं करना चाहते ? आखिर पुलिस वालों में इंसान होने के स्वाभाविक गुणों के विकास की जगह उनका खात्मा करने में तंत्र इतना ’तत्पर’ क्यों है? आखिर पुलिस के जवानों के सामाजिक और मानवीय ’गुण’ को प्रायोजित तरीके से सत्ता खत्म करने पर क्यों जुटी है? आदि अनेको सबाल हैं जिनका जबाब या तो कोई देना नही चाहता या फिर किसी के पास है ही नही!
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