पत्रकारों पर कार्रवाई और धमकियों से उठे प्रेस की स्वतंत्रता पर सवाल।
लखनऊ। उत्तर प्रदेश में पत्रकारों की सुरक्षा और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। बिजनौर में एक पत्रकार की बीच सड़क कथित पिटाई, सहारनपुर मस्जिद प्रकरण से जुड़ी खबर दिखाने वाली न्यूज 24 डिजिटल की पत्रकार पूजा अवस्थी पर FIR दर्ज होने और मुख्यमंत्री की प्रेस कॉन्फ्रेंस में सवाल पूछने वाली पत्रकार दिव्या श्रीवास्तव को कथित तौर पर घर बुलडोजर से गिराने की धमकी दिए जाने आदि मामले वर्तमान में मीडिया और सोशल मीडिया पर सुर्खियां बने हुए जिससे पत्रकारिता जगत की चिंता बढ़ा दी है।
इन घटनाओं को लेकर पत्रकार संगठनों और मीडिया से जुड़े लोगों के बीच यह सवाल उठ रहा है कि यदि किसी पत्रकार के सवाल, रिपोर्टिंग या समाचार कवरेज से किसी को आपत्ति है तो उसका जवाब कानूनी और लोकतांत्रिक तरीके से दिया जाना चाहिए, न कि मारपीट, मुकदमे या धमकी के जरिए।
बिजनौर में बीच सड़क पत्रकार के साथ कथित मारपीट का मामला विशेष रूप से चिंता पैदा करता है। पत्रकार अपने काम के दौरान घटनाओं को सामने लाने और लोगों की आवाज शासन-प्रशासन तक पहुंचाने की जिम्मेदारी निभाते हैं। ऐसे में उनके साथ सार्वजनिक स्थान पर मारपीट की घटना केवल एक व्यक्ति पर हमला नहीं, बल्कि पत्रकारों की कार्य परिस्थितियों और सुरक्षा व्यवस्था पर भी सवाल खड़े करती है।
वहीं, सहारनपुर के मस्जिद प्रकरण को दिखाने को लेकर न्यूज 24 डिजिटल की पत्रकार पूजा मस्ती के खिलाफ एफआईआर दर्ज होने की खबर ने भी बहस को जन्म दिया है। पत्रकारिता में किसी घटना की रिपोर्टिंग को लेकर यदि तथ्यात्मक या कानूनी आपत्ति हो तो उसकी जांच और कार्रवाई निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के तहत होनी चाहिए। साथ ही यह भी जरूरी है कि पत्रकार के खिलाफ दर्ज मुकदमे को उसकी रिपोर्टिंग से जोड़कर देखने से पहले पूरे मामले के तथ्य सार्वजनिक और स्पष्ट किए जाएं।
दूसरी ओर मुख्यमंत्री की प्रेस कॉन्फ्रेंस में सवाल पूछने वाली पत्रकार दिव्या श्रीवास्तव को कथित तौर पर उनका घर बुलडोजर से गिराने की धमकी दिए जाने की बात सामने आने से मामला और गंभीर हो जाता है। लोकतंत्र में प्रेस कॉन्फ्रेंस का उद्देश्य ही सत्ता से सवाल पूछने और सरकार के पक्ष को जनता तक पहुंचाने का माध्यम उपलब्ध कराना है। सवाल कठिन हो सकते हैं, लेकिन उनका जवाब देना लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा है।
इन घटनाओं ने यह सवाल फिर सामने ला दिया है कि क्या पत्रकार बिना किसी दबाव या भय के सरकार और प्रशासन से सवाल पूछ सकते हैं? क्या किसी खबर या सवाल से असहमति होने पर पत्रकार को कानूनी प्रक्रिया के बजाय धमकी या दबाव का सामना करना पड़ेगा?
हालांकि, इन सभी मामलों में संबंधित पक्षों का आधिकारिक पक्ष और घटनाओं के पूरे तथ्य सामने आना जरूरी है। आरोपों की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच के बाद ही स्थिति पूरी तरह स्पष्ट हो सकेगी। लेकिन यदि पत्रकारों के साथ मारपीट या उन्हें उनके आवास को लेकर धमकाने जैसी बातें सही पाई जाती हैं, तो यह प्रेस की स्वतंत्रता और पत्रकारों की सुरक्षा के लिए गंभीर चिंता का विषय होगा।
लोकतंत्र में मजबूत मीडिया का अर्थ सरकार का विरोध करना नहीं, बल्कि सत्ता से सवाल पूछने और जनता के सामने तथ्य रखने की स्वतंत्रता है। पत्रकारों के सवालों का जवाब सवालों और तथ्यों से दिया जाना चाहिए—डर, दबाव और धमकी से नहीं।
(इमेज काल्पनिक है)







