
CRS NEWS लखनऊ। राजधानी लखनऊ में भैंसों की जब्ती को लेकर गद्दी समाज में नाराजगी का मामला सामने आया है। ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) उत्तर प्रदेश अध्यक्ष सेंट्रल शेख ताहिर सिद्दीकी ने प्रशासन और नगर निगम की कार्रवाई पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि कई परिवारों के घरों और डेरों से बड़ी संख्या में भैंसों को उठाकर ले जाया गया, जिससे पशुपालक परिवारों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है।
ताहिर सिद्दीकी ने कहा कि “लखनऊ में भैंसें नहीं, गद्दी समाज की रूह छीनी गई है।” उन्होंने कहा कि पशुपालन और दूध बेचकर अपना परिवार चलाने वाले लोगों के लिए भैंस महज पशु नहीं, बल्कि उनकी जीवनभर की पूंजी और रोजगार का साधन है। कार्रवाई के बाद कई परिवारों की महिलाएं और बच्चे परेशान हैं और उन्हें अपने भविष्य की चिंता सता रही है।
‘किसी के घर से 14 तो किसी की 25 भैंसें ले जाने का आरोप’
AIMIM नेता ने दावा किया कि अलग-अलग परिवारों की कई-कई भैंसें जब्त की गई हैं। उनके मुताबिक किसी परिवार की 14, किसी की 18 तो किसी की 25 तक भैंसें घरों और डेरों से उठाए जाने की बात सामने आई है। उन्होंने कहा कि इन परिवारों का मुख्य व्यवसाय दूध बेचकर घर का खर्च चलाना है। ऐसे में पशुओं के चले जाने से उनकी आय का प्रमुख साधन भी खत्म हो गया है।
उन्होंने एक पीड़ित महिला का हवाला देते हुए कहा कि परिवारों की महिलाओं का कहना है, “साहब, हमारी भैंसें ले गए, अब बच्चों को क्या पिलाएंगे और घर का खर्च कैसे चलेगा?” ताहिर ने कहा कि छोटे बच्चों और महिलाओं को इस तरह परेशान किए जाने के आरोप बेहद गंभीर हैं और प्रशासन को पूरे मामले की निष्पक्ष जांच करानी चाहिए।
बिना नोटिस और रसीद कार्रवाई का लगाया आरोप
ताहिर सिद्दीकी ने पुलिस और नगर निगम की कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि कुछ घरों में टीम के घुसने, ताले तोड़ने और महिलाओं के साथ कथित बदसलूकी की शिकायतें सामने आई हैं। उन्होंने कहा कि यदि किसी पशुपालक ने नियमों का उल्लंघन किया है तो उसके खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन जब्ती की प्रक्रिया में संबंधित परिवारों को नोटिस, पंचनामा और रसीद दी गई या नहीं, इसकी भी जांच होनी चाहिए।
उन्होंने प्रशासन से पूछा कि यदि किसी वाहन को जब्त किया जाता है तो उसके संबंध में चालान और कानूनी प्रक्रिया अपनाई जाती है, तो बड़ी संख्या में पशुओं को जब्त किए जाने के मामले में भी पारदर्शी प्रक्रिया क्यों नहीं अपनाई गई।
संविधान और कानून का हवाला देकर उठाए सवाल
AIMIM नेता ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 19(1)(g) के तहत नागरिकों को व्यवसाय और रोजगार करने की स्वतंत्रता प्राप्त है। उन्होंने कहा कि यदि कोई पशुपालक कानून के दायरे में रहकर दूध का कारोबार कर रहा है तो उसकी आजीविका के साधन को समाप्त करने से पहले वैधानिक प्रक्रिया का पालन होना चाहिए।
उन्होंने पशु कल्याण को लेकर भी सवाल उठाया। ताहिर सिद्दीकी का दावा है कि जब्त भैंसों को कांजी हाउस में पर्याप्त चारा और पानी नहीं मिलने की शिकायतें सामने आ रही हैं। उन्होंने प्रशासन से तत्काल यह सुनिश्चित करने की मांग की कि सभी पशुओं को पर्याप्त भोजन, पानी और आवश्यक देखभाल उपलब्ध कराई जाए।
बुद्धेश्वर की घटना का भी किया जिक्र
ताहिर सिद्दीकी ने बुद्धेश्वर में एक व्यक्ति द्वारा पुलिसकर्मी पर कथित हमले की घटना का जिक्र करते हुए कहा कि कानून हाथ में लेना किसी भी स्थिति में उचित नहीं है और ऐसी घटना की जांच कानून के अनुसार होनी चाहिए। हालांकि, उन्होंने सवाल उठाया कि “एक व्यक्ति की कथित गलती की सजा पूरे गद्दी समाज को क्यों दी जाए?”
उन्होंने कहा कि किसी एक व्यक्ति की कार्रवाई के आधार पर पूरे समुदाय के पशुपालकों की रोजी-रोटी प्रभावित नहीं होनी चाहिए। उन्होंने प्रशासन से आग्रह किया कि कार्रवाई व्यक्ति और कानून के उल्लंघन के आधार पर हो, किसी समुदाय को सामूहिक रूप से निशाना बनाकर नहीं।
नीलामी रोकने और पशुओं को चारा-पानी देने की मांग
AIMIM नेता ने जिलाधिकारी लखनऊ और नगर आयुक्त से तत्काल हस्तक्षेप की मांग करते हुए चार प्रमुख मांगें रखीं। उन्होंने कहा कि जब्त भैंसों की नीलामी पर तत्काल रोक लगाई जाए और पशुओं के मालिकों को कानूनी प्रक्रिया के तहत अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाए। साथ ही कांजी हाउस में बंद पशुओं को पर्याप्त चारा और पानी उपलब्ध कराया जाए।
उन्होंने मांग की कि सभी पशु मालिकों को जब्ती की रसीद और कार्रवाई से संबंधित दस्तावेज दिए जाएं तथा यदि कोई जुर्माना या लाइसेंस संबंधी कार्रवाई बनती है तो उसे कानून के अनुसार पूरा किया जाए। इसके अलावा घरों में प्रवेश, ताला तोड़ने और महिलाओं से कथित बदसलूकी के आरोपों की भी निष्पक्ष जांच कराई जाए।
ताहिर सिद्दीकी ने कहा कि “गद्दी समाज भीख नहीं, अपना संवैधानिक हक मांग रहा है।” उन्होंने प्रशासन से अपील की कि मामले को संवेदनशीलता के साथ देखा जाए और प्रभावित पशुपालक परिवारों की आजीविका बचाने के लिए कानून के तहत उचित समाधान निकाला जाए।







