
CRS NEWS AGENCY:-लखनऊ के बालागंज में एक 14 साल की बच्ची की ‘संदिग्ध’ मौत ने एक बार फिर यह सिद्ध कर दिया है कि हमारे विज्ञापनों की चमक और सड़कों की हकीकत के बीच की खाई को भरने के लिए अब मासूमों की लाशें ही काफी हैं। हम एक ऐसे दौर में जी रहे हैं जहाँ न्याय की गति बुलेट ट्रेन से भी तेज है—बशर्ते आप सड़क पर शव रखकर तीन घंटे जाम लगाने का हुनर जानते हों। लखनऊ के बालागंज में एक 14 साल की बच्ची की ‘संदिग्ध’ मौत ने एक बार फिर यह सिद्ध कर दिया है कि हमारे विज्ञापनों की चमक और सड़कों की हकीकत के बीच की खाई को भरने के लिए अब मासूमों की लाशें ही काफी हैं।
विज्ञापनों वाली सुरक्षा और हकीकत की ‘फांसी’
शहर की दीवारों पर चिपके गुलाबी पोस्टर चिल्ला-चिल्ला कर कहते हैं कि “बेटियां सुरक्षित हैं।” शायद इसीलिए एक नाबालिग बच्ची को सीतापुर के अपने घर से दूर, लखनऊ के एक ‘प्रतिष्ठित’ घर में काम करने भेजा गया था। उसे क्या पता था कि जिस शहर को विकास का इंजन बताया जा रहा है, वहाँ न्याय पाने के लिए भी परिवार को अपनी ही बेटी की लाश के साथ घंटों सड़क पर ‘धरना’ देना पड़ेगा।
वाह रे सिस्टम! पुलिस तब तक ‘आत्महत्या’ की कहानी गढ़ती रही, जब तक जनता ने बालागंज क्रॉसिंग को जाम नहीं कर दिया। क्या यह हमारे लोकतंत्र का नया ‘वर्किंग मॉडल’ है? पहले हादसा हो, फिर पुलिस लीपापोती करे, फिर जनता सड़क पर आए और तब जाकर कहीं एक ‘फॉर्मेलिटी’ वाली FIR दर्ज हो?
सत्ता का चश्मा और न्याय का ‘विसरा’
प्रशासन का आश्वासन वैसा ही है जैसा हर चुनाव से पहले का वादा—सुखद लेकिन खोखला। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में ‘हैंगिंग’ (फांसी) लिखकर शायद फाइल बंद करने की तैयारी थी, लेकिन ‘विसरा’ सुरक्षित रखकर हमें यह उम्मीद दी गई है कि इंसाफ की उम्मीद अभी ‘सुरक्षित’ (यानी लंबित) है।
अजीब विडंबना है—एक तरफ बड़े-बड़े सम्मेलनों में हम आधुनिक भारत की बात करते हैं, और दूसरी तरफ एक रसूखदार के घर में काम करने वाली बच्ची का वजूद इतना सस्ता है कि उसकी चीखें चारदीवारी के बाहर तक नहीं पहुंच पातीं। शायद सरकारी सीसीटीवी कैमरों की नजरें सिर्फ चालान काटने के लिए तेज हैं, बेटियों की सुरक्षा की निगरानी के वक्त उनमें ‘तकनीकी खराबी’ आ जाती है।
निष्कर्ष: जब सड़कों पर ही न्याय मिले
अगर आपको लगता है कि कानून का राज है, तो बालागंज की उस सड़क पर जाकर पूछिए जहाँ तीन घंटे तक एक परिवार अपनी मृत बच्ची को लेकर बैठा था। वहां आपको समझ आएगा कि ‘रामराज्य’ और ‘आमराज्य’ में कितना फर्क है।
सरकार से बस एक ही गुजारिश है: अगली बार जब आप महिला सुरक्षा पर कोई नया नारा गढ़ें, तो बालागंज की उस 14 साल की बच्ची की तस्वीर जरूर देख लें। शायद तब आपको अहसास हो कि न्याय ‘मिलेगा’ नहीं, उसे तो अब लाशों के साथ सड़क पर ‘छीनना’ पड़ता है।










