भगवान परशुराम की जन्मस्थली परशुरामपुरी को मिल रही नई पहचान, धार्मिक आस्था का बना प्रमुख केंद्र।
18 करोड़ रुपये से मंदिर परिसर का कायाकल्प, जुलाई 2026 तक पूर्ण होने की संभावना।
लखनऊ/शाहजहाँपुर। भगवान परशुराम जयंती के अवसर पर शाहजहांपुर जिले स्थित परशुरामपुरी एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। यह स्थान भगवान विष्णु के छठे अवतार भगवान परशुराम की जन्मस्थली के रूप में व्यापक रूप से माना जाता है। पूर्व में जलालाबाद के नाम से प्रसिद्ध यह क्षेत्र धार्मिक आस्था का प्रमुख केंद्र रहा है, जहां स्थित प्राचीन परशुराम मंदिर में हर वर्ष जयंती के अवसर पर श्रद्धालुओं की बड़ी संख्या उमड़ती है एवं पूरा क्षेत्र भक्ति, श्रद्धा और उत्सव के उल्लास से सराबोर हो उठता है।
इस स्थान की आध्यात्मिक महत्ता और धार्मिक पर्यटन की संभावनाओं को देखते हुए उत्तर प्रदेश पर्यटन विभाग द्वारा परशुराम मंदिर परिसर के सौंदर्यीकरण और कायाकल्प का कार्य कराया जा रहा है। लगभग 18 करोड़ रुपये की लागत से विकसित हो रही इस परियोजना में अब तक 11 करोड़ रुपये स्वीकृत किए जा चुके हैं। अधिकारियों के अनुसार परियोजना का कार्य तेज गति से प्रगति पर है और इसके जुलाई 2026 तक पूर्ण होने की संभावना है।
इस अवसर पर पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री जयवीर सिंह ने कहा,” भगवान परशुराम जयंती हमारी सभ्यतागत जड़ों से जुड़ने और धर्म व न्याय के प्रतीक भगवान परशुराम के आदर्शों को स्मरण करने का अवसर है। शाहजहांपुर की परशुरामपुरी, जिसे भगवान परशुराम की जन्मस्थली माना जाता है, ऐतिहासिक रूप से पहले जोगीखेड़ा और बाद में जलालाबाद के नाम से जानी जाती रही है। आज यह स्थान पुनः अपनी पारंपरिक पहचान ‘परशुरामपुरी’ के रूप में स्थापित हो चुका है, जो हमारी सांस्कृतिक विरासत के प्रति बढ़ते सम्मान और ऐतिहासिक धरोहरों को पुनर्स्थापित करने की दिशा में एक सकारात्मक संकेत है।”
उन्होंने कहा कि वर्ष 2025 में लगभग 60 लाख पर्यटकों ने शाहजहांपुर का भ्रमण किया, जो जिले के धार्मिक स्थलों के प्रति बढ़ती आस्था और आकर्षण को दर्शाता है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में राज्य सरकार ऐसे महत्वपूर्ण विरासत स्थलों का विकास कर प्रदेश में धार्मिक पर्यटन को सशक्त बनाने के लिए प्रतिबद्ध है।
परशुराम मंदिर परिसर के सौंदर्यीकरण एवं कायाकल्प के अंतर्गत श्रद्धालुओं की सुविधाओं को ध्यान में रखते हुए विभिन्न विकास कार्य कराए जा रहे हैं। इनमें सत्संग भवन, मल्टीपर्पस हॉल (जिसका प्रथम तल निर्मित हो चुका है), ट्रस्ट कार्यालय एवं पुजारी कक्ष, मंदिर मंडप, पार्किंग तथा डॉरमेट्री का निर्माण और मुख्य प्रवेश द्वार व कवर्ड शेड का विकास शामिल है। इसके साथ ही आंतरिक व बाह्य विद्युतीकरण, सत्संग भवन में लिफ्ट की स्थापना, अग्नि सुरक्षा व्यवस्था तथा माइक एवं साउंड सिस्टम की व्यवस्था भी की जा रही है। इसके अतिरिक्त मंदिर मंडप और सत्संग भवन में पिंक शेड स्टोन कार्य तथा मंदिर परिसर में सीसी रोड निर्माण का कार्य भी परियोजना के अंतर्गत किया जा रहा है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान परशुराम का जन्म वैशाख शुक्ल तृतीया को महर्षि जमदग्नि और माता रेणुका के यहां हुआ था। धर्मग्रंथों में वर्णित है कि उन्होंने उस काल में अधर्म और अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष करते हुए धर्म की स्थापना की। कार्तवीर्य अर्जुन का वध, कामधेनु की पुनर्प्राप्ति और पिता की हत्या का प्रतिशोध उनके जीवन से जुड़ी प्रमुख कथाएं मानी जाती हैं। भगवान परशुराम को राम जमदग्न्य और राम भार्गव के नाम से भी जाना जाता है। हिंदू परंपरा में उन्हें भगवान विष्णु का ऐसा अवतार माना जाता है जो आज भी पृथ्वी पर विद्यमान हैं और कल्कि पुराण के अनुसार भविष्य में भगवान कल्कि को युद्ध और तपस्या की शिक्षा देंगे।
अपर मुख्य सचिव, पर्यटन, संस्कृति एवं धर्मार्थ कार्य विभाग, अमृत अभिजात ने कहा, “परशुरामपुरी केवल एक धार्मिक स्थल ही नहीं, बल्कि हमारी सभ्यतागत विरासत और आस्था पर्यटन की महत्वपूर्ण कड़ी है। मंदिर परिसर के कायाकल्प के माध्यम से राज्य सरकार श्रद्धालुओं को बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराने के साथ-साथ एक समग्र तीर्थ अनुभव विकसित करने की दिशा में कार्य कर रही है। इस प्रकार की पहलें प्रदेश के विरासत स्थलों और जीवंत धार्मिक परंपराओं को पुनर्जीवित करने के साथ उत्तर प्रदेश को आध्यात्मिक और सांस्कृतिक पर्यटन के प्रमुख केंद्र के रूप में स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।”










