विकास/सौंदर्यकरण और जमीनी मुद्दों से भटकते, नए जनप्रतिनिधित्व की दौड़ के नए नए युवा।
शाहजहांपुर/तिलहर। गलियों की सड़के टूटी हुई और उनमें रुका हुआ सड़ता पानी, जिसमें पनपते मच्छरों ने लोगों का जीना और सोना मुहाल कर रखा हो, पीने का पानी, कर्मचारियों की मर्जी पर ही उपलब्ध हो सकता है अन्यथा नहीं, और ऐसे में हाउस टैक्स (गृहकर और जलकर) जमा करने का नोटिस तत्काल प्रभाव से मिलने पर उसे जमा करना अनिवार्य हो जाता है लेकिन जब विकास नहीं तो गृहकर/जलकर क्यूं..? सरकार से मिल रही ग्रांड को कौन से विकास कार्यों में लगाया जा रहा है, यह सवाल तो बनता है।

स्थानीय स्तर की जनप्रतिनिधिता की प्रतिस्पर्धा में दो चार जुमले बुलंद कर भीड़ जमा करना काफी आसान है लेकिन जुमलो में जमीनी मुद्दे नहीं छिपते। नगर भी गलियों और नालियों का हाल किसी से छिपा नहीं है। “नगर लगते जाम को ई-रिक्शा और रेहड़ी व पटरी यानी सब्जी और फ्रूट के ठेली थैलियों की भीड़ पर डालना आसान कर लिया परंतु बीते 10 वर्षों में नगर पालिका प्रशासन नगर में एक भी बेडिंग जोन तथा रिक्शा स्टैंड नहीं दे सका” जनप्रतिनिधिता की दौड़ में युवा नेताओं के लिए यह मुद्दे जमीनी मुद्दे नहीं बनते।
विगत दो वर्षों में जल जीवन मिशन एवं गैस की लाइन डालने वालो ने सड़को को खोदने में कोई कसर नहीं छोड़ी लेकिन सड़को को बनवाने की बात तो दूर रही उनकी मरम्मत भी नहीं हो सकी और न ही लोगों को अब तक गैस और पानी ही मिल सका, तो स्थानीय स्तर का यह बिल्कुल भी मुद्दा नहीं है क्योंकि इससे तो ऊपर तक पहुंचने वाली इनकम बोलने नहीं दे सकती। पालिका परिषद की बोर्ड कुर्सी की चाहत में स्थानीय स्तर पर पब्लिक को वहकाना वर्तमान दौर में मुमकिन नहीं लेकिन फिर कहीं न कहीं गरीबी से जूझने वाले दर्जनों ऐसे व्यक्तित्वों की कमी नहीं जिन्हें डरा/धमका कर उनसे घंटों तेज धूप में मुर्दाबाद के नारे लगवाए जा सकते होंगे।










