विकास के दावों की हकीकत: तीन साल से अटका ओवरब्रिज, हर बारिश में डूबता तिलहर और बंद पड़ा बस अड्डा।


तिलहर/शाहजहांपुर। विकास के बड़े-बड़े दावों के बीच तिलहर की जमीनी तस्वीर कई सवाल खड़े करती नजर आ रही है। कहीं वर्षों से अधूरी परियोजनाएं इंतजार कर रही हैं तो कहीं बुनियादी सुविधाओं के अभाव में नगरवासी परेशान हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि विकास की तस्वीर आखिर कागजों पर ज्यादा दिखाई दे रही है या धरातल पर?
बारिश का मौसम आते ही तिलहर में जलभराव की समस्या सामने आ जाती है। हर वर्ष नगर के विभिन्न हिस्सों में पानी भरने की शिकायतें सामने आती हैं, लेकिन स्थायी जल निकासी व्यवस्था अब भी सवालों के घेरे में है। यदि वर्षों से एक ही समस्या बारिश के साथ दोहराती आ रही है तो फिर विकास के दावों के बीच इसका समाधान क्यों नहीं हो सका, यह सवाल नगरवासियों के बीच चर्चा का विषय है।
रेलवे ओवरब्रिज भी विकास की रफ्तार पर सवाल खड़ा करता है। स्थानीय निवासियों के मुताबिक रेलवे ओवर ब्रिज परियोजना करीब तीन वर्षों से लंबित है। इसके कारण बड़े ग्रामीण क्षेत्र से आने-जाने वाले लोगों के साथ छोटे दुकानदार भी प्रभावित हैं। आवागमन की परेशानी का असर तिलहर के बाजार पर पड़ने की आम चर्चा है।
हालांकि अग्निशमन थाना, ब्लॉक परिसर के पीछे निर्माणाधीन है लेकिन फिलहाल स्थिति स्पष्ट नहीं होने के कारण यह भी नगर विकास में गंभीर चर्चा का विषय बना हुआ है जबकि स्थानीय स्तर पर इसे लेकर उम्मीद जरूर जताई जा रही है, लेकिन सवाल यही है कि यह सुविधा वास्तव में कब से काम करना शुरू करेगी। किसी परियोजना की घोषणा और उसके वास्तविक संचालन के बीच का अंतर ही उसकी उपयोगिता तय करता है।
सवाल केवल सरकारी अर्ध सरकारी इमारतों के निर्माण मात्र का नहीं, बल्कि निर्माण के बाद, उनसे नगरवासियों को मिलने वाली सुविधा का भी है। स्थानीय स्तर पर बड़ी चर्चा है कि कई संस्थानों के निर्माण के बावजूद उनके संचालन से नगरवासियों को अपेक्षित सुविधा नहीं मिल रही है। ऐसे में विकास कार्यों की गिनती केवल भवन बनने से होनी चाहिए या जनता को मिलने वाली वास्तविक सुविधा से—यह विचारणीय प्रश्न है।
दशकों अतिक्रमण की बाहों में रहा और अतिक्रमण मुक्त कराने के बाद में तिलहर बस अड्डे की स्थिति भी जनसुविधाओं के दावों पर सवाल खड़े करती है। स्थानीय दावे के अनुसार पिछले करीब तीन वर्षों से बसों का संचालन बंद है। यहां तक कि बस अड्डे में जनसुविधा के नाम पर स्वच्छ भारत मिशन के अंतर्गत नगर पालिका द्वारा निर्माण कार्य गया एकमात्र शौचालय भी अब कभी नहीं खुलता उसे सदैव बंद ही देखा जाता है। यदि सार्वजनिक परिवहन केंद्र ही नियमित संचालन से बाहर है तो यात्रियों के लिए इसका वास्तविक उपयोग कितना रह गया है, यह सवाल स्वाभाविक है।
तिलहर की जनता को आंकड़े नहीं चाहिए, धरातल पर सुविधाओं की भी आवश्यकता महसूस होती है। विकास को लेकर उठ रहे सवालों का जवाब किसी राजनीतिक बयान से अधिक धरातल पर दिखाई देने वाले परिणामों से मिल सकता है। जनता यह देखना चाहती है कि जलभराव से राहत मिली या नहीं, ओवरब्रिज पूरा हुआ या नहीं, बसें चल रही हैं या नहीं और सरकारी संस्थानों का लाभ वास्तव में नगरवासियों तक पहुंच रहा है या नहीं।
कहा जाता है कि विकास का दावा तभी मजबूत माना जा सकता है जब उसका असर आम आदमी के रोजमर्रा के जीवन में दिखाई दे। जनता को घोषणाएं नहीं, परिणाम चाहिए। यही वह कसौटी है जिस पर तिलहर के विकास के दावों को परखा जाना बाकी है।






