आजादी के 79 वर्ष बाद भी तिलहर रेलवे स्टेशन की व्यवस्था कर रही है यात्रीयों का उत्पीड़न।


यात्रियों के लिए एक भी स्वतंत्र फुट ओवर ब्रिज देने में स्थानीय जनप्रतिनिधि नाकाम।
तिलहर/शाहजहांपुर। रेलवे अधिनियम की कई धाराओं का उल्लंघन करने के बाद यात्री तिलहर रेलवे स्टेशन की टिकिट बिंदु तक पहुंचते है और यह हाल फिलहाल की नहीं बल्कि लगभग सदी पूर्व की इस परंपरा की हजारों बदलाव के बाद भी बरकरार रखा गया है।
50 के दशक में भले ही तिलहर नगर की आबादी को रेलगाड़ी की जरूरत कम रही हो लेकिन समय के साथ बढ़ती आबादी में अब फिलहाल रेलवे सेवा तिलहर और आसपास क्षेत्र के वासियों के लिए जीवन रेखा से कम नहीं लेकिन उन्हें आज भी रेलवे स्टेशन की टिकिट विंडो तक पहुंचने के लिए जहां रेलवे अधिनियमो की अनेक धाराओं का उल्लंघन करना पड़ता है तो वहीं यात्रा से लौटने पर ट्रैक पार करने में अपना जीवन दांव पर लगाना पड़ रहा है।
भारतीय रेलवे अधिनियम, 1989 की धारा 147 के अनुसार, रेलवे परिसर में इस प्रकार प्रवेश को अवैध माना जाता है जबकि बिना टिकिट यात्रा भी अपराध है तो आखिर तिलहर क्षेत्रवासी यात्रा करने के लिए टिकिट विंडो तक पैदल लंबा सफर तय करे या फिर प्लेटफॉर्म नं० 3 से 2 को अवैध रूप पार करने में रेलवे अधिनियम की धारा 147 उल्लंघन कर अपराध करें। यह खुले आम जागती आंखों से स्थानीय जनप्रतिनिधि भी देखते है लेकिन बीते 5 दशक में इस समस्या का निस्तारण करने में किसी ने कोई दिलचस्वी नहीं दिखाई।
क्या कहते है स्थानीय निवासी:जिस संबंध में कई बार चर्चा करने पर मालूम हुआ कि अक्सर रेलवे द्वारा सख्ती किए जाने पर यात्रा के लिए टिकिट को विंडो पर जा रहे यात्रियों को स्टेशन परिसर में ड्यूटी कर रहे कर्मचारियों के कोपभाजन का शिकार होते देखा जा सकता है और यह स्थिति उस समय काफी खराब होती है जब कोई बूढ़ा व्यक्ति रेलवे स्टेशन का गेट संख्या 334 बी को लंबी दूरी तय कर टिकिट विंडो तक पहुंचने में असमर्थ होता है। जो कि अब अक्सर अधिकांश बंद रहता है।
बरेली, और शाहजहांपुर तक की 50 से 100 रु० की यात्रा में अक्सर 1,000 रुपये तक का जुर्माना भरने को विवश स्थानीय नागरिकों से स्थानीय जन प्रतिनिधि, चुनाव के मद्देनजर भले ही हजार वादे क्यों न करते दिखाई पड़े लेकिन चुनाव जीतने के बाद नागरिकों की इस मूलभूत समस्या निस्तारण व मौलिक अधिकारों का हनन रोकने में किसी भी जनप्रतिनिधि को गंभी नहीं देखा गया।





