बारिश ने खेतों में खड़ी उम्मीदों पर फेरा पानी, अब मुआवजे के सर्वे पर टिकी किसानों की नजर।
रत्तीभर नुकसान वाले किसान भी सूची में शामिल होंगे या सर्वे की पारदर्शिता पर उठेंगे सवाल?
उत्तर प्रदेश। लगातार हो रही बारिश ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है। खेतों में तैयार खड़ी धान की फसल समेत कई अन्य फसलों को बारिश से भारी नुकसान पहुंचने की बात सामने आ रही है। जिन खेतों में किसान ने महीनों की मेहनत, समय और पूंजी लगाकर अच्छी फसल की उम्मीद बांधी थी, वहां अब पानी और खराब मौसम ने उनकी मेहनत पर पानी फेर दिया है।
महंगाई के इस दौर में फसल का नुकसान किसान के लिए केवल खेत में खड़ी उपज का नुकसान नहीं है, बल्कि उसके पूरे घरेलू बजट पर इसका असर पड़ता है। बीज, खाद, सिंचाई, मजदूरी और अन्य कृषि खर्च पहले ही किसान की लागत बढ़ा चुके हैं। ऐसे में तैयार फसल के नुकसान के बाद उसके सामने अगली फसल की तैयारी और परिवार की जरूरतों को पूरा करने की दोहरी चुनौती खड़ी हो जाती है।
सरकार और जिला प्रशासन की ओर से बारिश से प्रभावित फसलों का सर्वे कराकर पात्र किसानों को नियमानुसार राहत और मुआवजा देने की प्रक्रिया शुरू की जाती है। लेकिन इस पूरी व्यवस्था की सफलता केवल सर्वे शुरू होने से नहीं, बल्कि इस बात से तय होगी कि सर्वे वास्तव में खेतों की स्थिति के अनुरूप कितना निष्पक्ष और पारदर्शी होता है।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या बारिश से प्रभावित हर किसान का नुकसान सर्वे में दर्ज होगा? जिस किसान की फसल का थोड़ा भी हिस्सा प्रभावित हुआ है, क्या उसकी वास्तविक स्थिति भी रिकॉर्ड में शामिल की जाएगी? या फिर सर्वे के दौरान कुछ किसानों को अधिक और कुछ को कम नुकसान दिखाए जाने जैसी शिकायतें सामने आएंगी?
किसानों के बीच यह आशंका भी रहती है कि कहीं सरकारी राहत की प्रक्रिया में बिचौलियों या भ्रष्टाचार की गुंजाइश न बन जाए। यदि कहीं सर्वे के नाम पर धन की मांग की जाती है या पात्र किसान को छोड़कर प्रभावशाली लोगों को लाभ पहुंचाने का प्रयास होता है, तो इसका सीधा नुकसान उस किसान को होगा जिसकी फसल वास्तव में बर्बाद हुई है।
इसलिए जरूरत केवल सर्वे कराने की नहीं, बल्कि हर खेत तक पहुंचकर वास्तविक नुकसान दर्ज करने की है। सर्वे में लगे कर्मचारियों की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए और प्रक्रिया ऐसी होनी चाहिए जिसमें किसान अपनी क्षतिग्रस्त फसल की स्थिति स्पष्ट रूप से दर्ज करा सके। साथ ही सर्वे के आंकड़ों की निगरानी और शिकायतों के निस्तारण की व्यवस्था भी प्रभावी होनी चाहिए।
बारिश प्राकृतिक आपदा है और किसान मौसम को नियंत्रित नहीं कर सकता। लेकिन नुकसान के बाद मिलने वाली सरकारी राहत की प्रक्रिया पारदर्शी हो, यह प्रशासन के हाथ में है। किसान को मुआवजा किसी एहसान के रूप में नहीं, बल्कि निर्धारित नियमों के तहत मिलने वाली राहत के रूप में मिलना चाहिए।
अब किसानों की नजर प्रशासन के सर्वे पर है। देखना यह होगा कि सरकारी मशीनरी खेतों तक कितनी ईमानदारी से पहुंचती है और बारिश से प्रभावित किसानों की वास्तविक तस्वीर सरकारी रिकॉर्ड में कितनी सही दर्ज हो पाती है। क्योंकि फसल का नुकसान खेत में दिखाई देता है, लेकिन मुआवजे की निष्पक्षता सरकारी सर्वे की कलम तय करती है।






