
कर्बला, एक संघर्ष, एक आंदोलन और एक विचारधारा का नाम है। यह वह समय था कि इस्लाम उन शक्तियों (बनी उमैय्या) के हाथ में था जिन्होंने इस्लाम के सिद्धांत और पैग़ाम का हमेशा विरोध किया। पैग़मबर मुहम्मद (स) को जिस्मानी और ज़ेहनी अज़ियतें दीं और अंत में जब बस नहीं चला तो मजबूरन इस्लाम क़ुबूल किया,या यूँ कहें कि इस्तिस्लाम किया। इस तबक़े को इस्लामी तारीख़ में तूल्क़ा कहा जाता है, यानी माफ़ी दिये गये लोग। पैग़मबर (स) की वफ़ात के बाद ख़िलाफ़त का दौर शुरू हुआ और तीसरे दौर के आख़िरी दौर में इस्लाम के चिर विरोधियों ने सत्ता पर क़ब्ज़ा शुरू कर दिया। अपने दौर ए ख़िलाफ़त में हज़रत अली (अ) ने इन शक्तियों के ख़िलाफ़ संघर्ष किया लेकिन उनकी हत्या कर दी गयी और इस्लाम पर बनी उमैय्या का पूरी तरह क़ब्ज़ा हो गया।सब कुछ इतिहास में दर्ज है कि इन शक्तियों ने किस तरह इस्लाम का नाम लेकर अवाम पर अत्याचार किये।
जब ख़िलाफ़त की गद्दी पर यज़ीद बैठा तो सब तरफ़ बेचैनी के बादल छा गये और सबने पैग़म्बर (स) के प्रिय नाती और फ़ातिमा और अली के एक मात्र जीवित पुत्र, इमाम हुसैन (अ) की तरफ़ उम्मीद के साथ देखना शुरू किया।
इमाम हुसैन (अ) के विषय में शायद ही कोई ना जनता हो, आज तक नमाज़ के ख़ुतबे में इन्हें जन्नत के युवकों का सरदार कहा जाता है। इनसे मुहब्बत ईमान की अलामत है। अनेक बार पैग़म्बर (स) ने इनके बारे में ताकीद की है और यहाँ तक कहा कि हुसैन ओ मिन्नी व अनामीनल हुसैन – हुसैन मेरा मुझसे है और मैं हुसैन से हूँ। यज़ीद ने गद्दी पर बैठते ही हुसैन (अ) से बैयत (pledge of allegiance) के लिये कहा,, हुसैन का जवाब इतिहास में दर्ज है:
“जिस इस्लाम का ख़लीफ़ा यज़ीद हो उस इस्लाम को हमारा दूर से सलाम।”
इमाम हुसैन (अ) ने मदीना छोड़ दिया, मक्का चले आए क्योंकि यहाँ युद्ध या किसी भी प्रकार की हिंसा निषिद्ध थी। लेकिन, जल्द ही मालूम हो गया कि हुकूमत के जासूस और एजेंट उनकी यहाँ गुप्त रूप से इमाम की हत्या कर सकते हैं। इमाम ने इराक़ के शहर क़ूफ़ा का रुख़ किया, साथ में चंद दोस्त, परिवार के लोग ही थे। कर्बला नामक जगह पर यज़ीद के गवर्नर इबने ज़्याद के सेनापति उमर इबने साद बिन अबि विक़ास ने एक बड़े लश्कर के साथ हुसैन का रास्ता रोका और यज़ीद की हुकूमत को तसलीम करने को कहा। हुकूमत जानती थी कि हुसैन से बैयत लेने का अर्थ है कि उसे legitimacy मिलना। हर प्रकार से लालच दिया गया, डराया गया, धमकाया गया लेकिन हुसैन मुहम्मद के नाती थे, फ़ातिमा और अली के बेटे थे, यही कहते रहे कि किसी भी हालत में वह अत्याचारी हुकूमत का समर्थन नहीं करेंगे। तब कर्बला केवल एक जंगल थी एक नदी बहती थी, जिस पर पहरे बिठा दिये गये। यह हालत तीन दिन तक बनी रही और अंत में केवल जंग ही अंतिम विकल्प रहा तो इमाम ने यह रास्ता चुना और अपने परिवारजनों और साथियों (कुल बहत्तर) के साथ हज़ारों का सामना किया और तीन दिन की प्यास के साथ शहीद हो गए।
इमाम कि एक बेटे का ज़िक्र ज़रूरी है जिसका नाम है अली अकबर। वाक़िया यूँ है कि एक बार मक्का से कर्बला के सफ़र के दौरान इमाम को घोड़े पर ही नींद आ गयी, सपने में देखा कि कोई कह रहा है यह क़ाफ़िला मौत की तरफ़ बढ़ रहा है। इमाम की आँख खुल गयी और यह बात अट्ठारह वर्षीय बेटे अली अकबर को बतायी। देखिये बेटे ने क्या सवाल किया? बाबा हम हक़ (सही रास्ते) पर तो हैं, इमाम ने कहा “हाँ”। अली अकबर ने कहा कि फिर क्या सोचना कि मौत हम पर आ गिरे या हम मौत पर।
इमाम के इस संघर्ष में महिलाओं ने भी बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया। कई महिलायें घायल और वीरगति को भी प्राप्त हुईं। इमाम की शहादत के बाद उनकी बहन ज़ैनब ने आंदोलन की बागडोर सम्भाली। इमाम के परिवारजनों को क़ैद कर लिया गया, मीडिया के ज़रिये यह बताया गया कि यह बाग़ी हैं, ग़लत प्रचार किया गया। लेकिन, क़ैदियों का क़ाफ़िला जिस रास्ते से गुज़रता, ज़ैनब तथ्यों को सामने रखतीं और सच्चाई बताती। क़ूफ़े के गवर्नर के दरबार में और उसके बाद दमिशक़ (Syria की राजधानी) में यज़ीद के दरबार में ज़ैनब ने हुकूमत के ख़िलाफ़ ग़ज़ब का भाषण दिया, यज़ीद के सवालों का ऐसा जवाब दिया कि उसे ख़ामोश होना पड़ा।
ऐसे हालात यहाँ भी हैं, देश में ऐसी शक्तियों के हाथों में सत्ता है जो राष्ट्रीय आंदोलन की विरोधी रही है, झूठ और फ़रेब इसका हथियार है। कर्बला, हुसैन और ज़ैनब जनप्रतिरोध के प्रतीक हैं जिनसे अत्याचारी सत्ता हमेशा ख़ौफ़ ज़दा रहती हैं।
जोश के अनुसार:
जब तक एक़्दार से अग़राज़ हैं गर्म ए पैकार
करबला हाथ से फेंकेगी न हरगिज़ तलवार
कोई कह दे ये हुकूमत के निगहबानों से
करबला एक अबदी जंग है सुल्तानों से
शाज़ू नक़वी










