
CRS NEWS AGENCY :- हाल ही में एक प्रभावशाली संबोधन में, डॉ. लक्ष्मण यादव ने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) के वर्तमान प्रशासन और देश की बदलती शिक्षा नीति पर तीखा प्रहार किया है। उनका तर्क है कि विश्वविद्यालय केवल डिग्री देने वाले संस्थान नहीं, बल्कि सत्ता से सवाल पूछने और वैचारिक स्वतंत्रता के केंद्र हैं, जिन पर आज खतरा मंडरा रहा है।
प्रशासनिक विफलता और जातिवाद पर प्रहार
यादव ने JNU की कुलपति (VC) के हालिया पॉडकास्ट की कड़ी आलोचना करते हुए उसे तर्कहीन बताया। उन्होंने कुलपति द्वारा की गई टिप्पणियों को ‘जातिवादी’ करार दिया और आरोप लगाया कि हाशिए पर रहने वाले समुदायों को केवल ‘पीड़ित’ के रूप में दिखाना उनकी ऐतिहासिक गरिमा और संघर्ष का अपमान है।
भ्रष्टाचार और नियुक्तियों में धांधली।
लेख का एक मुख्य अंश विश्वविद्यालयों में हो रही नियुक्तियों पर केंद्रित है। यादव ने आरोप लगाया कि वर्तमान में योग्यता के बजाय विचारधारा और ‘रिश्वत’ (लेन-देन) के आधार पर नियुक्तियां की जा रही हैं। उन्होंने इसे एक ऐसी साजिश बताया जो उच्च शिक्षा की गुणवत्ता को जड़ से खत्म कर रही है।
UGC के नए नियमों को ‘धोखा’ बताते हुए यादव ने चेतावनी दी कि ये नीतियां SC, ST और OBC समुदायों के उत्थान को रोकने के लिए बनाई गई हैं। फीस वृद्धि और निजी शिक्षा को बढ़ावा देने के पीछे का असली मकसद शिक्षा को आम जनता की पहुंच से दूर करना है।
अंत में, यादव ने छात्रों और शिक्षकों से एकजुट होने की अपील की। उनका मानना है कि JNU और अन्य विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता को बचाना केवल एक संस्थान को बचाना नहीं, बल्कि भारत के लोकतंत्र और भविष्य को बचाना है।








