
आज दिनाँक 30 सितंबर 2023 को बतरस संस्था द्वारा एक कार्यक्रम का आयोजन हुआ जो कि बतरस के नवनिर्मित भवन (बतरस हॉल)/प्रज्ञा भवन में यह पहला कार्यक्रम है जिसमे आदरणीया तारा इक़बाल एवं डॉक्टर शैलेश प्रताप सिंह का काव्यपाठ होना तय किया गया था जो की बेहद शानदार तरीके से संपन्न हुआ……
इस कार्यक्रम में भाग लेने हेतु शिवेंद्र गदागंज से निकलें पहुंचते ही देखा कि तारा इक़बाल जी , डॉ कृष्ण कुमार जी,डॉ शैलेश प्रताप सिंह जी, डॉ विनय भदौरिया जी, सुरेश आचार्य जी, राजकुमार जी, दिलीप जी, दीपिका जी, रमन जी, अनुराग शुक्ल जी,रश्मि श्रीवास्तव जी, बतरस परिवार के संरक्षक श्री शिवा शंकर जी, अरुण जी, सविता सिंह जी, आनंद तिवारी जी, प्रीति श्रीवास्तव जी, भाई फ़राज़ शेख जी, महिमा, दिया, तेजस, एवं अम्बास्तु सहित बतरस के अनेक साथी उपस्थित थे ।
इस कार्यक्रम की रूपरेखा के अनुरूप आदरणीया तारा इक़बाल जी एवं डॉ शैलेश प्रताप सिंह जी को काव्यपाठ होना जिसकी विशेषता यह थी कि श्रोता छक कर ग़ज़ल/कविता सुनेंगे और कवि/शायर जब तक चाहे अपनी रचना सुनायें..
अर्थात् जी भर के सुना गया फिर भी कसक तो बाकी रह ही जाती है चाहे जितनी देर तक सुना जाये ..
कार्यक्रम के प्रारम्भ में दिलीप जी ने सभी साथियों को एक-दूसरे का परिचय दिया जिसके बाद डॉ विनय भदौरिया जी की अध्यक्षता में कार्यक्रम का प्रारंभ हुआ उसके बाद तारा इक़बाल जी के सम्मान हेतु दीपिका रमन जी को आमंत्रित किया ।
इसके बाद कृष्ण कुमार जी ने बतरस के इस आयोजन पर संक्षिप्त प्रकाश डालते हुए सर्वप्रथम डॉ शैलेश प्रताप सिंह जी को काव्यपाठ हेतु आमंत्रित किया जिसका आनंद हम सबने खूब उठाया जिनकी पंक्तियां कुछ इस प्रकार हैं…
शाम हमको भी थोड़ी सुहानी मिले
मिले पेंशन तो हमको पुरानी मिले
ये मुनासिब नहीं है किसी भी तरह
दूध के नाम पर हमको पानी मिले
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ज़िंदगी ने दिए थे उजाले बहुत
हमने मन में वहम अपने पाले बहुत
तथ्य कुछभी न था सत्य कुछभी न था
व्यर्थ के अर्थ हमने निकाले बहुत
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मुफ़्त देते हैं मशविरा कुछ लोग
करते रहते हैं तज़्किरा कुछ लोग
हर दफा मैं ही गलत समझा गया
कैसे करते हैं तब्सिरा कुछ लोग
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इसके बाद कृष्ण कुमार जी और अग्रज शैलेश जी का आदेश टालना संभव नहीं था अतः आपके अभिषेक अंकुर ने भी अपनी रचना से रूबरू कराया जो इस प्रकार है
जहाँ यकीन है तुमको ,वो सहारा है क्या !
जिसे अपना समझते हो ,तुम्हारा है क्या !
यकीन मानो कोई काम आ गया होगा,
बिना मतलब के कभी उसने पुकारा है क्या !
ख्वाब, आँसू, उदासी ,दर्द, बेचैनी औ गम,
इन फसानों मे कहीं जिक्र तुम्हारा है क्या !
तुम कभी भूल के भी याद नही करते हो ,
याद करने का धरम, सिर्फ हमारा है क्या !
जिन्हें शिद्दत से प्यार करते हैं !
उन्हीं को , राजदार करते हैं !
जोभीदिल के करीब लगते हैं,
उन्हें अपना शुमार करते हैं !
आप कुछ न करें हमारे लिये,
हम , मगर , एतबार करते हैं !
तेरा दुःख दर्द समझ लेते हैं ,
यही तो गमगुसार करते हैं !
आइये एक साथ चलते हैं ,
हम तेरा इंतजार करते हैं !
इसके बाद जिन्हे सुनने हेतु हम सब उपस्थित हुए हैं या यूँ कहें जिन्हे सुनने हेतु ही यह कार्यक्रम आयोजित किया गया आदरणीया तारा इक़बाल जी जिन्हे हम रेख्ता जैसे प्रतिष्ठित वेबसाइट से पढ़ते और सुनते आ रहे थे किंतु कोई मुलाकात न हुई थी और न ही अभी जल्दी संभव नजर आ रही थी किंतु इसी बीच आप बतरस परिवार से जुड़ी उसके कुछ दिन बाद मैं आपसे ।
सच्चाई ये भी कहूंगा कि सबसे पहले जब आपसे सोशल मीडिया के माध्यम से मैं जुड़ा तो थोड़ा भ्रम जरूर था कि आप ही हैं या कोई और उसी नाम का परंतु जुड़े तो यह भ्रम दूर हो गया …
कृष्ण कुमार जी ने आपकी अनेक शेर जो लोगों के बीच में सफर कर रहीं हैं उन्ही से आपको मंच पर आमंत्रित किया और फिर आपको प्रत्यक्ष रूप से सुन कर आनंद ही आ गया पंक्तियां इस प्रकार हैं
फ़ैसला ही ग़लत किया मैं ने
ख़ुद तिरा हिज्र चुन लिया मैं ने
जब भी याद आए दर्द के पंछी
इक परिंदा रिहा किया मैं ने
किस क़दर देख जज़्ब हूँ तुझ में
तू ने सोचा तो सुन लिया मैं ने
क्या कहना था भूल गई मैं आँखों की इस जल-थल में
अब के मिलने जाऊँगी मैं गिरह लगा कर आँचल में
जब तक उस का शहर दिखा देखा रेल की खिड़की से
बा’द हज़ीं फिर बैठ के मैं ने याद निचोड़ीं आँचल में
हुबहू उसको नक्ल क्या करते
वो तसव्वुर था शक्ल क्या करते
उसने तय कर लिया था जाने का
उसकी माज़ी में दख्ल क्या करते
उफ्फ ऐसे शोर से खामोशियाँ कहीं बेहतर
कि सांय-सांय में कुछ तो सुनाई देता है
इन गजलों के अलावा भी अनेक बेहतरीन अशआर और गज़लें सुनने का अवसर प्राप्त हुआ….
इसके बाद कार्यक्रम के अध्यक्ष आदरणीय डॉ विनय भदौरिया जी ने एक बेहतरीन नवगीत पढ़ा और शानदार ग़ज़ल सुनाई दादा अधिकांश गीत ही पढ़ते हैं किंतु आज ग़ज़ल सुन कर अच्छा लगा…
एक मुक्तक इस प्रकार है….
हम सुनाते हैं सुनना नहीं चाहते
लौह संबंध बुनना नहीं चाहते
भाई तो चाहते हैं लखन की तरह
किंतु हम राम बनना नहीं चाहते
इस दौरान चाय- नाश्ता, समोसा इत्यादि अनेक का लुत्फ उठाया जाता रहा….
अंत में अग्रज अनुराग शुक्ल जी ने धन्यवाद ज्ञापित किया।
इसी दौरान सविता सिंह जी जिनका इंतजार प्रारंभ से हो रहा था उनका आगमन हुआ आपने तारा इक़बाल जी एक खूबसूरत ग़ज़ल अपनी सुरीली आवाज़ में सुनाई एक विशेष बात दिलीप जी ने बताया की आपका जन्मदिन भी आज ही है तो जन्मदिन केक काटकर मनाया गया ….एकबार पुनः आपको जन्मदिन की अनेकानेक शुभकामनाएं आदरणीया सविता सिंह जी ..
कुलमिलाकर आज का दिन सार्थक एवं यादगार हो गया ।










