
डलमऊ रायबरेली
रिपोर्ट मोहम्मद अली
डलमऊ-रायबरेली रायबरेली से बड़ी खबर सामने आ रही है डलमऊ वन रेंज मैं वन विभाग की तरफ से नमामि गंगे योजना के तहत धूता ग्राम सभा में कई करोड़ के प्रोजेक्ट लगाए गए लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है आपको बता दें कि नमामि गंगे के तहत आए हुए खंभा बैरिकेडिंग पेड़ पौधे खाद पास जैसे अनेक सामग्री के साथ में कई बीघा में वृक्ष लगाने थे बैरिकेडिंग करनी थी लेकिन अधिकारियों की सांठगांठ से कुछ रोडसाइड काम कराया गया जिससे अधिकारी मौके पर आए देखें और खुश हो जाए क्योंकि एसी में बैठे हुए अधिकारी अंदर जंगल का मोआइना कहां करेंगे इसलिए रोडसाइड कार्य कराया गया बाकी जंगल के अंदर जगह जगह खंभे पड़े हुए हैं गड्ढे की तोपन नहीं की गई है ना पेड़ लगाए गए कई करोड़ का प्रोजेक्ट होने के नाते अधिकारियों ने खूब जमकर कि इसमें बंदरबांट ना लेबर का पैसा दिया गया न वन विभाग में कार्यरत वाचर का पैसा दिया गया वन विभाग में कार्यरत वाचर का कहना है कि अधिकारी अपने रिश्तेदार अपने ड्राइवर और करीबी लोगों के नाम से बिल वाउचर बनाकर पैसा निकाल लेते हैं हम लोग कड़ाके की धूप में जो कार्य करते हैं जंगल में खून पसीना बहाते हैं फिर भी हमें मजदूरी नहीं दी जाती है जब अधिकारी से पैसा मांगा जाता है तो उनके द्वारा बताया जाता है की नमामि गंगे योजना के अंतर्गत बजट ही नहीं आता यह कहकर टालमटोल करते रहते हैं और गरीब किसान मजदूर का भुगतान नहीं करते ना कोई कर्मचारी कभी देखने आता है क्योंकि सूत्रों की माने तो सब आपस में बंदरबांट कर लेते हैं इसलिए अभी जगह-जगह पर गड्ढा बना हुआ है पिलर पड़े हुए हैं पेड़ को लगाया नहीं गया ऐसे ही फेंक दिया गया है और तो और वन विभाग में आए हुए पिलर 2-3 ट्राली वनरक्षक केदार के द्वारा दूसरी जगह बेच भी दी गई है जब इसकी जानकारी ली गई है तो बताया गया कि रेंजर साहब ने बोला है साहब खाए मलाई लेबर खाए धूल जब आई नमामि गंगे मां बजट तब हमें रिश्तेदार हुई है खुश वर्कर लेबर साहब की बजट ना आने वाली बातों को सुनकर हो जाएंगे चुप l
सबसे बड़ा सवाल यह है कि
क्या नमामि गंगे योजना के अंतर्गत वाचर और लेबर की मजदूरी नहीं आती l
कई करोड़ के प्रोजेक्ट नमामि गंगे को देखने के लिए उच्च अधिकारियों को समय क्यों नहीं मिलता l
यदि 5 साल में एक करोड़ पेड़ लगाए गए तो उसमें से कितने पेड़ तैयार किए गए यह किसकी जिम्मेदारी होती है
क्या वास्तव में नमामि गंगे योजना के अंतर्गत बजट नहीं आया इसलिए वर्कर्स का पेमेंट नहीं दिया गया l
यह अत्यधिक बजट देख कर अधिकारियों का मन बदल गया और आपस में ही बंदर बांट कर लिए l










