
CRS NEWS:- अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने मुस्लिम ब्रदरहुड की लेबनान, जॉर्डन और मिस्र शाखाओं को आतंकी संगठन घोषित कर दिया है, जिससे पाकिस्तान के दोस्त तुर्कि, कतर नाराज़ हो सकते हैं। ट्रंप प्रशासन के इस फैसले का मतलब है कि ट्रांसनेशनल सुन्नी इस्लामी ग्रुप की लेबनानी, जॉर्डनियन और मिस्र की शाखाओं को आतंकवादी संगठन घोषित करना है। ये सब ईरान पर अमेरिकी हमले की अटकलों के बीच हुआ है। ट्रंप प्रशासन के इस फैसले को माना जा रहा है कि इससे मुस्लिम देशों में खलबली मच सकती है। मुस्लिम ब्रदरहुड पर एक्शन तुर्कि और कतर को नाराज कर सकता है। इससे अमेरिका के साथ उसके रिश्ते खराब हो सकते हैं, कतर पहले ही इजरायल से नाराज चल रहा है।
विदेश विभाग के इस ज्वाइंट एक्शन से मुस्लिम ब्रदरहुड की लेबनान, जॉर्डन और मिस्र की शाखाओं पर कड़े प्रतिबंध लग गए हैं। इसे विदेशी आतंकी संगठन की लिस्ट में डाल दिया गया है। इसके तहत इस समूह को किसी भी तरह की मदद देना अब अमेरिका में आपराधिक अपराध माना जाएगा।
वहीं अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कहा कि यह मुस्लिम ब्रदरहुड की हिंसा और अस्थिरता फैलाने की कोशिशों को रोकने के लिए चल रही कोशिशों की शुरुआत है। रुबियो ने चेतावनी दी कि अमेरिका हर उपकरण का इस्तेमाल करेगा ताकि मुस्लिम ब्रदरहुड की इन शाखाओं को आतंकवाद में शामिल होने या समर्थन देने के लिए संसाधनों से वंचित किया जा सके।
संगठन का इतिहास:-
मुस्लिम ब्रदरहुड की स्थापना 1928 में मिस्र के इस्माइलिया शहर में हसन अल-बन्ना (Hassan al-Banna) नामक एक स्कूल शिक्षक ने की थी, जिसका उद्देश्य इस्लाम के सिद्धांतों को आधुनिक समाज के लिए मार्गदर्शन बनाना और शरिया कानून के आधार पर एक इस्लामी राज्य स्थापित करना था। यह एक इस्लामी राजनीतिक और धार्मिक संगठन है जो जल्द ही पूरे अरब जगत में फैल गया और इसके कई देशों में शाखाएँ स्थापित हो गईं। मुस्लिम ब्रदरहुड यानि जमात अल-इखवान अल-मुस्लिमीन को 1928 में मिस्र में हसन अल-बन्ना ने स्थापित किया था, जिसकी विचारधारा ये है कि ‘इस्लाम ही समाधान’ है। इसका मकसद हर जगह शरिया कानून स्थापित करना है।
मुस्लिम ब्रदरहुड का दावा है कि वो अब चुनाव और अन्य शांतिपूर्ण तरीकों से इस्लामी शासन स्थापित करना चाहते हैं, लेकिन इस ग्रुप के कई शाखाओं के पास हथियारबंद लड़ाके हैं। आलोचक इस संगठन को बहुत बड़ा खतरा मानते रहे हैं।
अमेरिका के इस फैसले का संयुक्त अरब अमीरात ने स्वागत किया है, जबकि तुर्की के लिए ये एक बड़ा झटका है, क्योंकि राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप एर्दोगन इस विचारधारा के समर्थक माने जाते हैं।











