
भाजपा और उसके सहयोगी दल वर्षों से स्वदेशी के नाम पर जनता को उपदेश देते रहे हैं और चीन से आयात के खिलाफ बड़े-बड़े बहिष्कार अभियानों का ढोल पीटते रहे हैं। लेकिन हाल के घटनाक्रमों ने इन दावों की पोल खोल दी है। जिस चीन के उत्पादों के बहिष्कार के लिए भाजपा समर्थक गली-मोहल्लों में अभियान चलाते थे, उसी देश से जुड़े लोगों का अब खुलेआम स्वागत और उनसे मुलाक़ातें हो रही हैं।
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि यह स्थिति अचानक पैदा नहीं हुई है, बल्कि इसकी तैयारी लंबे समय से चल रही थी। सवाल यह उठता है कि यदि आज औपचारिक मुलाक़ातें सामने आ रही हैं, तो फिर जनता को बरसों तक बहिष्कार का नाटक क्यों दिखाया गया? क्या यह सब सिर्फ समर्थकों को भ्रमित करने और भावनात्मक मुद्दों पर लामबंद करने के लिए था?
सबसे चौंकाने वाली बात यह भी बताई जा रही है कि जिन लोगों से मुलाक़ात की जा रही है, उनका भारत में किसी प्रकार का स्पष्ट पंजीयन या वैधानिक पहचान काग़ज़ों में मौजूद नहीं है। इसके बावजूद राजनीतिक स्तर पर संवाद और स्वागत कई गंभीर सवाल खड़े करता है।
भाजपा समर्थकों के बीच भी इसको लेकर गहरी निराशा देखी जा रही है। जो लोग कभी चीनी सामान के बहिष्कार के लिए घर-घर जाकर अपील करते थे, वे आज स्वयं को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। सोशल मीडिया और व्हाट्सएप समूहों में समर्थक आपस में चर्चा कर रहे हैं कि जिन पर भरोसा किया था, वही भरोसा तोड़ बैठे।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मामला भाजपा की कथनी और करनी के अंतर को उजागर करता है। स्वदेशी और राष्ट्रवाद के नाम पर खड़ी की गई पूरी इमारत अब सवालों के घेरे में है। हालात ऐसे बनते दिख रहे हैं मानो ‘रंगे सियार’ की कहानी एक बार फिर सच हो रही हो, जहां समय के साथ असली रंग सामने आ ही जाता है।








