
CRS NEWS AGENCY:- हाल ही में उत्तर प्रदेश की राजनीति में S.I.R. (Supplementary Electoral Roll) और फॉर्म को लेकर काफी गरमागरम बहस छिड़ी हुई है। न्यूज 24 की एक रिपोर्ट में राजीव रंजन ने इस पूरी प्रक्रिया के राजनीतिक और सामाजिक पहलुओं पर गहराई से चर्चा की है।
S.I.R. प्रक्रिया का अर्थ और प्रभाव
S.I.R. का मुख्य उद्देश्य मतदाता सूची को अपडेट करना है। 2003 और 2024 की मतदाता सूचियों के आधार पर उन लोगों को नोटिस जारी किए गए हैं जिनके नाम या पूर्वजों (माता-पिता/दादा-दादी) के विवरण 2003 की सूची में नहीं मिले थे। उत्तर प्रदेश में लगभग 3 करोड़ लोग इस प्रक्रिया से प्रभावित बताए जा रहे हैं।
पार्टी (SP) के नेता अखिलेश यादव ने गंभीर आरोप लगाए हैं कि सत्ताधारी दल (BJP) के कार्यकर्ता फॉर्म का गलत इस्तेमाल कर विपक्षी समर्थकों के नाम हटवा रहे हैं। इसी तरह के आरोप पश्चिम बंगाल में भी देखे गए थे, जहां एक ही व्यक्ति द्वारा कई फॉर्म भरकर खास तौर पर अल्पसंख्यक समुदायों को निशाना बनाने की बात सामने आई थी।राजनीतिक ज़मीनी हकीकत
समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ता ज़मीनी स्तर पर S.I.R. को लेकर काफी सक्रिय और जागरूक हैं।
दूसरी ओर, भाजपा कार्यकर्ता काफी हद तक प्रधानमंत्री मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की छवि पर निर्भर हैं।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ इस जमीनी सुस्ती (apathy) से वाकिफ हैं और विधानसभा में इन मुद्दों को सक्रियता से उठा रहे हैं।
हालांकि यह एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा है, लेकिन रिपोर्ट के अनुसार, उत्तर प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में आम जनता के बीच इसे लेकर अभी तक बहुत अधिक चिंता नहीं देखी गई है।
निष्कर्ष: मतदाता सूची की शुद्धता लोकतंत्र के लिए अनिवार्य है, लेकिन फॉर्म जैसी प्रक्रियाओं का राजनीतिकरण चुनावी निष्पक्षता पर सवाल खड़े करता है। निर्वाचन आयोग की नई सख्ती इस दिशा में एक सकारात्मक कदम है।।









